फैसला

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हम न चाहते हैं
सुनना किसी को,
बस तैयार
बैठे हैं अपनी कुर्सियों पर
कमीजों की आस्तीन चढ़ाकर
कोहनियों तक 
सुनाने को फैसला
हम भिनभिनाते हैं 
चीखते हैं, चिल्लाते है
दिखाना चाहते हैं के कमजोर नहीं हैं हम
हुई कैसी हिम्मत किसी के कुछ कहने की
हमारे बारे में
हमारी भाषा के बारे में
हमारे देश के बारे में
हमारी संस्कृति के बारे में
हम मिटाना चाहते हैं उसकी हस्ती
करना चाहते हैं बॉयकॉट
देते हैं सलाह उसे मर जाने की
लेकिन हम नहीं जानते हैं 
हमारा चीखना,चिल्लाना, बिलबिलाना
ही दर्शाता है कि 
कितने कमजोर हैं हम
कितनी कमजोर है हमारी भाषा
कितनी कमजोर है हमारी संस्कृति
क्योंकि लगता है हमें कि
कि किसी के शब्दों से 
वो चटक कर बिखर जाएंगे
कुछ ऐसे 
जैसे  उनके ही कंधों पर अभी तलक टिकी हुई थी वो
या उनके कहते ही छोड़ देंगे
सभी अपनी भाषा को
अपनी संस्कृति को
अपने देश को
मैं देखता हूँ सब कुछ
और मुस्कराता हूँ सोचकर 
के अंजान होने में 
मज़ा कुछ अलग सा ही है
और सोचता हूँ
जो डर है उन्हें
वो मैं क्यों नहीं महसूसता
क्यों मुझे विश्वास है
अपने देश पर
अपनी भाषा पर
अपनी संस्कृति पर
क्यों मानता हूँ मैं
कि किसी के कह भर देने से
न होगा उनका नुक्सान
ये थीं मेरे होने से पहले भी
रहेंगी मेरे होने की बाद भी
क्योंकि इनका होना न होना
निर्भर करता है बस
मुझ पर और मेरे जैसे असंख्य अन्य लोगों पर
हम पर 

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©विकास नैनवाल ‘अंजान’

About विकास नैनवाल 'अंजान'

मैं एक लेखक और अनुवादक हूँ। फिलहाल हरियाणा के गुरुग्राम में रहत हूँ। मैं अधिकतर हिंदी में लिखता हूँ और अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी करता हूँ। मेरी पहली कहानी 'कुर्सीधार' उत्तरांचल पत्रिका में 2018 में प्रकाशित हुई थी। मैं मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी नाम के कस्बे के रहने वाला हूँ। दुईबात इंटरनेट में मौजूद मेरा एक अपना छोटा सा कोना है जहाँ आप मेरी रचनाओं को पढ़ सकते हैं और मेरी प्रकाशित होने वाली रचनाओं के विषय में जान सकते हैं।

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0 Comments on “फैसला”

  1. अद्भूत रचनी रची है आपने। सराहनीय।
    शुरूआत से जो विषय को आपने पकड़ा…अंत भी प्रभावशाली तरिके से किया आपने।

  2. भरोसा दिल में हो तो कुछ कहने की जरूरत ही नहीं होती

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