जगमग-जगमग जुगनू टिमटिमाते

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नोट: यह कविता मेरे जब मेरे जहन में आई थी तो उस वक्त मेरी नींद टूट ही रही थी। सुबह हो चुकी थी और कविता की शुरुआती पंक्तियाँ मन में पनप रही थीं। मैंने अपनी अधखुली आँखों को मला, बिस्तर पर उठकर बैठ गया और इससे पहले की इस कविता को भूल जाता फोन निकालकर इसे नोट करने लगा। जब मैंने इसे लिखना खत्म किया तो यह कविता 43 पंक्तियों की हो चुकी थी। लेकिन मैं इससे संतुष्ट नहीं था। इसीलिए इस कविता को मैंने योगेश मित्तल सर को भेजा और उन्होंने इसमें काफी बदलाव किये और इसे 48 पंक्तियों का कर दिया।  इसके अलावा उन्होंने कविता और गीत लेखन से जुड़े काफी महत्वपूर्ण टिप्स भी मुझे दिए। यह कविता जितनी मेरी है अब उतनी ही उनकी हो चुकी है।

अब यह कविता आप सब लोगों के सम्मुख प्रस्तुत है।

योगेश मित्तल सर से आप फेसबुक के माध्यम से जुड़ सकते हैं:

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योगेश मित्तल सर ने काफी उपन्यास और कवितायें लिखी हैं। उपन्यासों की दुनिया के अपने अनुभव उन्होंने एक संस्मरण श्रृंखला में साझा किये थे। इस श्रृंखला को आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:

आइये, आपकी पुरानी किताबी दुनिया से पहचान करायें

कविता के प्रति आपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी।

जगमग-जगमग जुगनू टिमटिमाते, 

जैसे धरती पर आये हों तारे! 

दिन में सोते, रात को जागते

पास और दूर से लगते प्यारे! 

जुगनू सबके मन को भाते, 

जगमग-जगमग जुगनू टिमटिमाते! 

मुन्ना उन्हें देख मुस्कराता

उन्हें पकड़ने आगे आता! 

पर जैसे ही पास वो जाता

जुगनू एकदम से उड़ जाता! 

मुन्ना कहे ये क्यों मुझे सताते, 

जगमग जगमग जुगनू  टिमटिमाते! 

पापा मम्मी! दादा दादी!

पूछे मुन्ना अचरज में आते! 

ये जुगनू हैं कहाँ से आते

और फिर कहाँ को, ये चले जाते? 

मन को हर पल बहुत लुभाते! 

जगमग-जगमग जुगनू टिमटिमाते! 

शहरों में ये क्यों नहीं दिखते, 

गाँवों को ही क्यों रोशन करते! 

पापा मम्मी आप ही बतलाओ! 

मेरे प्रश्नों का उत्तर दे जाओ! 

मुझे क्यों अपना ये दोस्त न बनाते

जगमग-जगमग जुगनू टिमटिमाते! 

जगमग जगमग जुगनू प्यारा, 

जैसे आसमान से उतरा हो तारा! 

बेटा इसे प्यार से बुलाओ

इसे कैद करने मत जाओ! 

पापा आजादी का महत्व बताते, 

जगमग जगमग जुगनू टिमटिमाते! 

जहाँ प्यार हो, वहाँ विश्वास भी होता है! 

प्यार ही से रोशन यह संसार भी होता है! 

तुम भी दे दो इन्हें प्यार, 

ये भी बन जाएंगे तुम्हारे यार! 

मुन्ना को सब यही समझाते! 

जगमग-जगमग जुगनू टिमटिमाते! 

जुगनू चाहते ऐसा संसार

जहाँ हो हरियाली भरमार! 

इसीलिए ये शहर न जाते

गाँवों के ही चक्कर हैं लगाते! 

यह भी सब मुन्ना को बताते, 

जगमग जगमग जुगनू टिमटिमाते! 

मुन्ना सुनकर सबकी बातें

उन्हें मानते, अमल में लाते! 

अब जुगनू उनके पास आते

मुन्ना उन्हें देख मुस्कराते! 

खूब उछलते – खुश हो जाते, 

जगमग जगमग जुगनू टिमटिमाते! 

 

 © विकास नैनवाल ‘अंजान’

About विकास नैनवाल 'अंजान'

मैं एक लेखक और अनुवादक हूँ। फिलहाल हरियाणा के गुरुग्राम में रहत हूँ। मैं अधिकतर हिंदी में लिखता हूँ और अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी करता हूँ। मेरी पहली कहानी 'कुर्सीधार' उत्तरांचल पत्रिका में 2018 में प्रकाशित हुई थी। मैं मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी नाम के कस्बे के रहने वाला हूँ। दुईबात इंटरनेट में मौजूद मेरा एक अपना छोटा सा कोना है जहाँ आप मेरी रचनाओं को पढ़ सकते हैं और मेरी प्रकाशित होने वाली रचनाओं के विषय में जान सकते हैं।

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