माउंट आबू फेन मीट : #१ (शुक्रवार)

माउंट आबू एसएमपियन फैन मीट
शुक्रवार,19 मई 2017 




मैं अपनी दूसरी सुरेंद्र मोहन पाठक फैन मीट में शिकरत करने के लिए उत्साहित था। यह मीट विद्याधर भाई और शिवकुमार चेचानी भाई होस्ट करने जा  रहे थे। इस मीट के विषय में निर्धारण तो चित्रकूट मीट के दौरान ही हो गया था। ;लेकिन मीट किस जगह  होगी इसका निर्धारण में थोड़ा वक्त लगा। शुरुआत में गुजरात में इस मीट को रखना चाह रहे थे। उधर दो तीन जगह भी निर्धारित कर ली थी। लेकिन दो दिनों के प्रोग्राम के हिसाब से इसमें काफी दौड़ भाग हो रही थी इसलिए जगह गुजरात से बदल कर माउंट आबू कर ली गयी। शिव भाई और विद्याधर भाई मीट से  पहले ही जगह और होटल आदि का बंदोबस्त करके आ गये थे।मुझे इस मीट में शिरकत करना ही था। मैंने जाने का तो प्लान बहुत पहले बना दिया था लेकिन जाना किस तरह था इसका निर्धारण काफी रुचिकर तरीके से हुआ।

शुरुआत में हम एक और मेम्बर  की गाडी को ही साझा करके जाने वाले थे लेकिन फिर निर्धारित तारीक से कुछ दिन पहले ही उन्हें किन्हीं परिस्थितयों के कारणवश अपना आना रद्द करना पड़ा। इसका असर ये हुआ कि मेरा  जाना भी मुश्किल लगने लगा।

मुझे अब आई आर सी टी सी ,जो  मुझे  किसी दैत्य के सामान खड़ा अट्टहास करते हुए महसूस हो रहा था,से जूझना था । मुझे लगा जैसे वो कह रहा हो बच्चू अभी तक बचे हुए थे मेरे सामने आने से लेकिन अब आये हो पहाड़ के नीचे। यहाँ एक बात मैं बता देना चाहता हूँ कि ट्रेंन सफर का मुझे रत्ती भर भी आईडिया नहीं है। अगर इस मीट की दो रेल यात्राओं को भी जोड़ा जाए तो भी जीवन के सत्ताईस सालों में की गयी  मेरी सारी रेल यात्राओं का जोड़ मुश्किल से १० पार करेगा। और इनमे से मैंने टिकट खाली एक ही यात्रा की करी थी। वो तब की जब मैं मुंबई से गुड़गांव शिफ्ट हो रहा था। तो कहने का लब्बोलबाब ये ही है कि रेल में सफ़र  के विषय में मेरी जानकारी नगण्य है। और अब  आगे क्या होगा ये सोच कर ही मेरे हाथ पाँव फूले हुए थे।

लेकिन फिर एक बात थी जिसने मुझे हौसला दिया था। मैं संपियन्स के साथ यात्रा करने वाला था और मुझे विश्वास था कि कुछ न कुछ जुगाड़ तो होगा ही। पाठक साहब के पाठक अपने जिंदादिली के लिए यूं ही मशहूर नहीं है। उस गाडी में मैं कुलदीप भाई, अल्मास  भाई के साथ ही जाने वाला था तो एक दिन अल्मास भाई ने ही फोन किया कि जाने का क्या विचार है। मैंने कहा गाडी तो कैंसिल है और उनसे पूछा कि वो कैसे आ रहे हैं। (इससे पहले कुलदीप भाई से भी बात हो चुकी थी और उनका आना भी मेरी ही तरह में लटका लग रहा था। ) उन्होंने कहा चित्रकूट से दीपक भाई भी कोशिश कर रहे हैं और अगर होता है तो उधर से हो सकता है।(दीपक भाई ने रशीद भाई के साथ मिलकर बेहतरीन चित्रकूट मीट आयोजित की थी। दुर्भाग्यवश मैं उसके  विषय में मैं इधर नहीं लिख पाया था। लेकिन उसकी यादें मेरे जेहन में अभी तक हैं। ) मैंने अपने आप को उनको ही सौंपते हुए कहा कि देखो मेरा भी कुछ  कर ही दो।

बस फिर क्या था। जब अगली बार उनका कॉल आया तो उन्होंने खुशखबरी दी। नहीं नहीं! वो पिता नहीं बनने वाले थे। अभी तो वो शादी के बंधन में भी नहीं बंधे हैं और इसी मामले में दिल्ली में रहते हुए भी उनकी दिल्ली दूर है।  बस हुआ ऐसा था कि  हमारा जाने की टिकट कन्फर्म हो चुकी थी। हाँ, वापस आने की माउंट आबू रोड से आश्रम एक्सप्रेस में थी और वो अभी वेटिंग चल रही थी। वेटिंग बीस थी तो उम्मीद थी कि वो भी कन्फर्म हो सकती थी। फिर एक बार पहुँच गए तो वापस तो कैसे भी करके आया जा सकता था। मैं काफी खुश था और उसका सारा क्रेडिट संपियनस  को था।अब हम लोग पाँच थे जो इस सफर को करने वाले थे। दीपक भाई, जो चित्रकूट से आ रहे थे, कुलदीप भाई, अल्मास भाई,  योगी भाई और मैं। सफ़र मजेदार कटने वाला था। मस्ती होनी थी क्योंकि मुझे चित्रकूट वाला अनुभव था और उसमे कुलदीप भाई, अल्मास भाई और योगी भाई के साथ ही मैंने सफ़र किया था।

मैं यात्रा के दिन का बेसब्री से इतंजार करने लगा था। गुरुवार का दिन आया तो मैं बहुत उत्त्साहित था। ऑफिस में सबको अपनी यात्रा के विषय में पहले ही बता दिया था। गुरुवार की रात को सब पैकिंग भी कर ली थी।मैंने उसी दिन अनिल मोहन का उपन्यास जान के दुश्मन  भी खत्म किया और उसके विषय में  अपने विचार भी पोस्ट कर दिए। मुझे पता था कि मैं बाहर जा रहा था तो ये काम हो जाये तो बढ़िया रहेगा। वापस आने पर काफी कुछ लिखने के लिए होगा और वक्त की कमी पढ़ सकती है। ये किया और फिर आराम से सो गया।

शुक्रवार सुबह उठा। साढ़े पांच बज रहे थे। अपने लिए चाय बनाई। और जब तक वो बन रही थी तब तक अपनी चंदेरी यात्रा  पोस्ट की। ये यात्रा मैंने उससे पिछले हफ्ते की थी और मैं इसे पोस्ट करके ही जाना चाहता था। इसके बाद दो दिन से शेव नहीं की थी तो वो की और फिर पूरी तरह से रेडी होकर ऑफिस के लिए निकल गया।
ऑफिस का पूरा दिन आने वाली यात्रा के विषय में सोच सोच कर ही निकला। इसी में जितने काम हो सकते थे निपटाए। हिंदी पॉकेट बुक्स से कुछ किताबें मंगवाई थी। उन्होंने कुछ किताबें तो भेजी थी लेकिन कूरियर वाले ने किसी गार्ड को वो दे दी थी और उसने मुझ तक उसे नहीं पहुँचाया था। अब दिक्कत ये थी मैं हिंदी बुक सेण्टर वालों से इस विषय में बात कर रहा था। ये झन्झट भरा काम था लेकिन करना तो था ही। उन्होंने मुझे जवाब दिया कि किसी रणजीत को दिया है मैंने उनसे कहा कि मुझे फ़ोन नंबर तो दें। अब उन्होंने मुझे फोन नंबर देना था। देखें उसमे क्या होता है।

जब साढ़े तीन हो गये तो मैंने अपने सामान दोबारा जांचा। बैग थोड़ा भरी लग रहा था तो मैं देखना चाह रहा था कि ऐसा क्या है जिसे मैं हटा सकता था। सामान जांचा तो मैं अपने साथ सुरेन्द्र मोहन पाठक जी के दो उपन्यास मझसे बुरा कौन और मुझसे बुरा कोई नहीं के इलावा किनडल और मोहन राकेश जी का उपन्यास न आने वाला कल ले जा रहा था। इनमे से मैंने मुझसे बुरा कौन (आखिर पाठक साहब की मीट जो थी) और न आने वाला कल ही ले जाने का ही निर्णय किया। इसके इलावा एक बार जो जूते ले जा रहा था उन्हें भी ऑफिस में छोड़ने की सोची लेकिन उधर जगह न होने के कारण इस को न किया। खैर, एक किनडल और एक उपन्यास से आधा किलो तो कम हुआ ही होगा। इसके इलावा ऑफिस से पानी ले जाने का प्लान था तो उसे भी अमल में नहीं लाया। करीब चार बजे तक मैं तैयार था।

ग्रुप में लगतार सबके अपडेट्स मिलते जा रहे थे। योगी भाई ने सीट्स के विषय में भी जानकारी दे दी थी दीपक  मौर्य भाई कबके स्टेशन पहुँच चुके थे। उनके साथ कुलदीप भाई और योगी भाई भी थे। अल्मास  भाई भी उन्ही के साथ थे। मैंने पिछले बार हजरत निजामुद्दीन में चित्रकूट मीट के वक्त कदम रखा था। उस वक्त मैं राजीव चौक से होता हुआ इन्द्रप्रस्थ आया था। इस बार मैंने केन्द्रीय सचिवालय से ट्रेन बदल कर आने की सोची। गूगल से हल्का आईडिया मैं ले चुका था। साढ़े चार के करीब मैं ऑफिस से निकला। कुलदीप भाई का फोन आया कि किधर हो तो मैंने उनसे कहा कि मैं ऑफिस से निकल रहा हूँ और एक आध घंटे में पहुँचता हूँ।

ऑफिस से जब निकला तो एक बात अच्छी लगी। आसमान में बादल छाये हुए थे तो मौसम चलने लायक हो रखा था। मेरे ऑफिस से मेट्रो स्टेशन दस पन्द्रह मिनट पैदल चलकर पहुँचा जा सकता है। मैं पैदल चलना ही पसंद भी करता हूँ। और इस बादलों वाले मौसम में जब हल्की ठंडी सी हवा चल रही हो तो पैदल चलने का अपना मज़ा है।  दिन में जब एक बार ऑफिस से नीचे गया था तो उस वक्त काफी धूप थी। अगर मैं आस्तिक होता तो कहता कि भगवान् भी मेरी इस यात्रा से खुश थे इसलिए उन्होंने मेरे आराम का पूरा बंदोबस्त किया था।

खैर, कुछ ही देर में मेट्रो में था। उधर लम्बी पंक्ति में लोग खड़े थे। मैं भी पीछे लग गया। फिर अचानक से एक मेट्रो के सुरक्षाकर्मी आये और उनहोंने मुझसे कहा कि आप दूसरे गेट पे क्यों नहीं जाते वो खाली पड़ा है। अब अंधे को क्या चाहिए दो आँखें। मैं तुरन्त उधर चला गया और जहाँ मुझे दस मिनट इंतजार करना था वहीं तुरन्त गेट से पार हो गया। फिर मैं ऊपर समयपुर बादली की तरफ जाती मेट्रो वाले प्लेटफार्म की ओर बढ़ गया। उधर पहुँचा तो थोड़ी ही देर में मेट्रो आ गयी। वो खाली थी तो मुझे सीट भी मिल गयी। मैं अब आराम से बैठ गया था। मैंने मोहन राकेश जी का उपन्यास निकला और आगे पढने लगा।

इस उपन्यास का मुख्य नायक एक पहाड़ी कसबे में जूनियर हिंदी टीचर है। वो अपने जीवन से खुश नहीं है। उसे कुछ खलता है लेकिन उसे ये नहीं पता कि क्या ? उसकी शादी हो चुकी है लेकिन शादी ने भी वो कमी पूरी नहीं की है। इस उपन्यास के नायक से मैं थोड़ा बहुत जुड़ाव महसूस कर रहा हूँ। जैसा अधूरापन और विचार  उसके मन में उठ रहे  हैं, वैसी ही मेरे मन में भी उठ रहे  हैं। कभी कभी मुझे भी उसके जैसा ही प्रतीत होता है। इसीलिए उसका जीवन आगे कैसा होगा ये जानने की रूचि है। क्या पता मेरी अन्दर उमड़ रहे ख्यालों के जवाब भी मिल जायें।

ट्रेन आगे बढ़ चुकी थी।,मैं अपनी किताब में नज़र गढ़ाए हुए था। कुछ स्टॉप्स गुजरने के बाद मेरे कान में एक युवती की आवाज़ आई। वो  मेरे आगे युवती खड़ी हुई थी। मुझे ध्यान नहीं कि वो कब मेरे आगे आकर खड़ी हो गयी थी। मैं अपने उपन्यास में मसरूफ था और फिर मैं लेडीज सीट पर भी नहीं बैठा था। और जहाँ तक सीट देने की बात हुई तो मैं केवल बुजुर्गों या उन महिलाओं को जो छोटे बच्चों के साथ हैं (मुझे पता है छोटे बच्चे कितना थका सकते हैं) या जो अधेड़ हैं  को सीट देना पसंद करता हूँ। बाकी युवतियों और जवान औरतें चूँकि मेरी नज़र में आदमियों के बराबर हैं इसलिए उन्हें सीट देना का कोई तुक मुझे नज़र नहीं आता। इसलिए मेरा उस युवती को सीट देने का कोई तुक तो नज़र नहीं आ रहा था।  लेकिन वो अब किसी से फोन में बात कर रही थी और चूँकि सामने खड़ी थी तो वार्तालाप के टुकड़ों को मैं भी न चाहते हुए सुन पा रहा था। वो कह रही थी कि ऑफिस में उसे चोट लग गयी थी और इसलिए वो जल्दी आ गयी थी। वो शायद अपनी बड़ी बहन से बात कर रही थी और उसे इस ट्रेन में काफी दूर जाना था। मुझे केंद्रीय सचिवालय तक जाना था। अब मैं पशोपेश में पड़ गया कि सीट दूँ  या न दूँ। पहले उसे सीट देने का कोई तुक नहीं था लेकिन अब एक कारण मुझे पता चल चुका था। मैं मेट्रो के गेट के नज़दीक ही बैठा था तो जितने स्टेशन बचे थे उतने में मुझे वहीं सामने खड़े रहना था। ऐसे में वो क्या सोचती इसका ख्याल मन में आ रहा था। लेकिन फिर एक आध स्टॉप गुजरने के बाद मैंने उठने का ही फैसला किया। मैं अपनी सीट से उठ गया और चूँकि वो सामने खड़ी थी तो आकर बैठ गयी। उम्मीद है उसकी आगे की यात्रा आरामपूर्वक गुजरी होगी।

अब मैं खड़ा होकर उपन्यास पढ़ रहा था। क्योंकि मेरे पास रकसैक था इसलिए उसे दोनों टांगों के बीच फंसाकार गेट के नज़दीक वाले पोल पर टेक लगाए हुए था। कुछ ही देर बाद स्टेशन आने वाला था। अभी तक ज्यादातर स्टेशन दायीं तरफ आ रहे थे तो मुझे लगा केंद्रीय सचिवालय भी उधर को ही आएगा। इसलिए केन्द्रीय सचिवालय के वक्त मैं दायें वाले गेट के पास चले गया। जब केन्द्रीय सचिवालय आया तो एहसास हुआ कि उसके लिए बायाँ जाना चाहिए था। अब जल्दबाजी में उधर को गया।  मेरे साथ एक दो बन्दे और थे जिन्हें ऐसा ही कंफ्यूजन हुआ था। गेट के तरफ जाते हुए रास्ते की भीड़ को किसी तरह चीरते हुए बहार निकला। जब गेट के बाहर निकला तो एक ही बात कान में पड़ी,’क्या इतनी देर तक सोये रहते हैं। ‘ वक्त होता तो शायद जवाब भी देता लेकिन अभी तो मुझे केन्द्रीय सचिवालय से मंडी हाउस के लिए गाड़ी पकडनी थी और उधर से इंद्रप्रस्थ के लिए। ‘शायद’ इसलिए कि कई बार चुप रहना भी फायदेमंद होता है। झिक झिक से ज्यादा फायदा भी नहीं होता।
ऊपर को चढ़ा और निर्देशों का पालन करते हुए उस प्लेटफार्म तक पहुँचा जहाँ से मंडी हाउस के लिए गाड़ी मिलती। मैं ट्रेन का इन्तजार करने लगा। एक ट्रेन उधर थी लेकिन वो भरी हुई थी। मेरा रकसैक काफी बड़ा था इसलिए मैं उस पर नहीं चढ़ पाया। दूसरी मेट्रो के लिए दो चार मिनट इन्तजार करना पड़ा। इस दौरान मेरे मन में एक बार ख्याल आया कि अगर राजीव चौक उतर कर आता तो इस इंतजार से बच जाता लेकिन फिर ये भी ख्याल आया कि उधर से ऊपर चढ़ना होता तो उसमे वक्त तो जाना ही था। इसलिए जो हो चुका था उसमे कुछ नहीं किया जा सकता। अब तो ट्रेन के आने का इंतजार होना था। इसी सोच में था कि ट्रेन भी  आ गयी।

ये मेट्रो मंडी हाउस तक ही जाती थी। मैं इस पर चढ़ गया। जब मैं मेट्रो में था तो मुझे अल्मास भाई का फोन आया। उन्होंने मेरे से मेरी लोकेशन पूछी तो मैंने उन्हें बता दिया कि मंडी हाउस जा रहा हूँ। उन्होंने कहा कि वो जंगपुरा पहुँचने वाले हैं। फिर आखिर में हमारे बीच ये ही निर्धारित हुआ कि हम निजामुद्दीन ही मिलेंगे। मेट्रो मंडी हाउस पे रुकी और मैं बाहर निकला।

अब मुझे इंद्रप्रस्थ तक जाना था। मुझे ये ध्यान नहीं था कि इन्द्रप्रस्थ राजीव चौक की तरफ पड़ेगा या नॉएडा की तरफ। मैं इस रूट में नामात्र का सफ़र करता हूँ। इसलिए पहले उस प्लेटफार्म पर चला गया जहाँ से गाड़ी द्वारका को जा रही थीं। उधर प्लेटफार्म पर ही एक बोर्ड लगा देखा जिसमे स्टेशन लिखे हुए थे। उससे आईडिया हो गया कि मुझे सामने वाले प्लेटफार्म पर जाना है यानी नॉएडा वाली साइड जाना है। ऊपर जाते हुए एक व्यक्ति ने मुझे पूछा कि नॉएडा कौन सी जाएगी तो मैंने उसकी शंका का भी निवारण किया। अब मैं प्लेटफार्म में पहुँच चुका था। थोड़े ही देर में मेट्रो आ गयी और मैं उस पर चढ़ गया। मंडी हाउस से एक स्टेशन छोड़कर दूसरा स्टेशन ही इन्द्रप्रस्थ था।

मैं उधर उतर गया। मुझे चित्रकूट मीट के दौरान इस बात का ज्ञान हो गया था कि इधर से रेलवे स्टेशन के लिए ऑटो मिल जायेंगे। ये ऑटो शेयरिंग बेसिस पर चलते हैं और बीस-तीस रूपये लेते हैं। मैं मेट्रो स्टेशन से बाहर निकला। उधर से निकलते ही एक व्यक्ति मेरे पास आ गया। उसने पूछा:
‘रेलवे स्टेशन?’
मैं :’जरूर’
वह : ‘कैसे? अकेले या शेयरिंग।’
मैं:’अकेले ही चल लूँगा।’
वह:’अकेले तो बहुत ज्यादा किराया हो जायेगा। आप एक काम करो नीचे उस ऑटो में बैठ जाओ। वो तैयार है शेयरिंग के लिए।’

मैं उस वक्त तो उधर से निकल गया और वो दूसरे यात्री को ढूँढने लगा। लेकिन थोड़ा दूर चलकर मैंने अपने आप को जरा देखा। क्या मेरे कपड़ों में कोई कमी थी कि उसे लगा भाई इसके पास से अकेले लायक पैसे न निकलने हैं।  या वो कोई भला मानस था जो जवान लड़कों की फिजूलखर्ची पर लगाम लगाना चाहता था। उसके ऐसे व्यवहार का क्या कारण था। ये एक राज ही था और शायद राज ही रहेगा।

खैर, मैं ब्रिज से नीचे उतरा तो शेयरिंग ऑटो वाले भाई के पास पहुँचा जो जाने को लगभग तैयार था। आगे में उसके बगल में जितनी जगह थी मैंने अपने को उधर संकुचित करके किसी तरह फिट कर लिया। ऑटो कुछ सिखाये न सिखाये कम जगह घेरना जरूर आपको सिखा लेता है। अब मैं निजामुद्दीन स्टेशन की तरफ बढ़ रहा था। स्टेशन की तरफ बढ़ते हुए एक जगह हमारा ऑटो रुक गया। उधर जाम लगा हुआ था। सामने एक बस थी और एक ऑटो था। दोनों ऐसे जुड़े हुए थे जैसे conjoined-twins हों। उन्होंने कुछ देर तक रास्ता रोका हुआ था। ऐसे में कुलदीप भाई का फोन आया। उन्होंने मुझसे पूछा मैं कहाँ हूँ तो मैंने कहा बस रेलवे स्टेशन पहुँचने वाला हूँ। उन्होंने कहा ठीक है तो वो लोग दीपक भाई के पास राजपूत होटल  में रुके हुए हैं और मैं उधर ही आ जाऊँ। अब मुझे थोड़ा कम सुनाई देता हैं इसलिए मैं राज पूत या राजदूत में भ्रमित था। लेकिन एक बार स्टेशन के बाहर पहुँच जाऊँ तो ये बातें साफ़ हो सकती थीं। सामने लोग बाग बस और ऑटो को अलग करने की जुगत लगाने में लगे थे। थोड़ी देर बाद एक उद्दमी आदमी की मेहनत का ही नतीजा था कि conjoined-twins अब अपने अपने सफ़र पर जाने के लिए आजाद थे। उसके चेहरे के भाव देखकर मुझे लगा जैसे वो एक सर्जन हो जो एक सफल ओपरेशन करके निकला हो। और वो किसी सर्जन से कम भी तो न था।

ट्रैफिक हटा तो हम भी आगे बढ़ गये। मैंने  ऑटो वाले भाई को पैसे दिए और आसपास के गेस्ट हाउस देखने लगा। कहीं भी राजदूत होटल नज़र नहीं आया। एक राजपूत करके गेस्ट हाउस था। मैंने फिर कुलदीप भाई को फोन मिलाया तो उन्होंने कहा कि आप किधर हो। मैंने कहा स्टेशन पर लेकिन कोई गेस्ट हाउस तो इधर दिख नहीं रहा।  मैंने कहा शायद मैं पीछे की साइड हूँ। उन्होंने फिर मुझे निर्देशित किया कि मैं एक नंबर की इन्क्वारी पर आऊँ और वो उधर ही मुझे लेने आ रहे हैं।  मैंने ठीक है कहा। और ऊपर चढ़ गया।

भीड़ भरा हज़रत निज़ामुद्दीन स्टेशन

अपना बैग चेकिंग मशीन में डाला और प्लेटफार्म १ की तरफ बढ़ गया। उधर उनका नामो निशान नहीं था। मैंने उन्हें दोबारा फोन किया तो उनका नंबर बिजी आ रहा था। फिर योगेश्वर भाई को कॉल किया तो किसी महिला ने उठाया और फोन कट गया। अब मैं एक नंबर के गेट पे खड़ा बोर सा हो गया था तो उधर से नीचे उतर गया और इधर उधर टहलने लगा। फिर गेट की तरफ आया और ऊपर चढ़ ही रहा था कि योगी भाई का दोबारा कॉल आया। उन्होंने बोला वो एक नंबर पे हैं। मैंने कहा मैं सीढियों पर हूँ और स्टेशन के बाहर जो एटीम हैं उधर को आता हूँ। फिर उधर पहुँचते हुए वो मुझे दिख गये।

अब ऑफिसियल रूप से मीट शुरू हो चुकी थी। हेल्लो हाई हुई। मैंने पूछा कि वो  तो 3 ही बजे पहुँच गये थे दीपक भाई से मिलने। उन्होंने कहा पहुँच तो गये थे लेकिन उन्हें काम के सिलसिले में वापस दफ्तर जाना पड़ा था। अब हम स्टेशन के अन्दर प्रविष्ट हुए। इस बार सीढ़ियों से चढ़ने के बजाए सामने वाले गेट से गये। फिर हम एक नंबर वाले ब्रिज पे खड़े होकर मेवाड़ एक्सप्रेस किस प्लेटफार्म पर खड़ी होगी इसका इंतजार करने लगे। इंडिकेटर पर तो कोई निर्देश नहीं दिख रहा था लेकिन हमे उधर थोड़ी ही देर हुई होगी कि एक उद्घोषणा हुई कि मेवाड़ एक्सप्रेस 7 नंबर पर लगी हुई है। अब देखो मैं उधर से ही १ नंबर प्लेटफार्म पर  पाया आया था और फिर वापस उधर ही जा रहा था। योगी भाई ने बाकियों को (दीपक भाई, कुलदीप भाई और अल्मास भाई) को इस बात की इत्तला की कि ट्रेन प्लेटफार्म नंबर ७ पर है। और प्लेटफार्म 7  की तरफ बढ़ गये।

हम प्लेटफार्म नंबर ७ पे पहुँच गये और अपने बर्थ वाले डब्बे  के निकट पहुँच गये। हमारी सीट्स एस 10 में थीं। अब हम बाकियों का इन्तजार करने लगे। हम तब तक वक्त काटने के लिए डिब्बे के सामने मौजूद  बुक स्टाल पर चले गये।  मैंने उधर कुछ किताबें देखी लेकिन मुझे कुछ पसंद नही आयीं। योगी भाई ने पूछा कि क्या मैंने इश्वाकू के वंशज पढ़ी है तो मैंने मना कर दिया।  मैंने कहाँ कि मैंने अमीश की मेहुला श्रृंखला पढ़ी थी।  लेकिन ये काफी पहले की बात है।

हम बात ही कर रहे थे कि  थोड़ी देर में ही कुलदीप भाई, दीपक  भाई और अल्मास भाई आ गये।  हेल्लो हाई हुई।  अभी हम स्टाल के बाहर ही थे। उधर उन्होंने भी थोड़ा ब्राउज किया लेकिन किसी ने कुछ खरीदा नहीं। ट्रेन सात पाँच की थी और उसे चलने में अभी भी दस मिनट के  करीब रहे होंगे। हम लोग अब अपनी सीट्स की तरफ चल दिए। सीट्स पे पहुँचे। हमारी सीट 18,19,21,22 ,24 थीं। सीट्स पे सामान रख कर वो लोग कुछ देर के लिए बाहर चले गये। और मैंने ‘मुझसे बुरा कौन’ निकाल ली। मुझे ये तो पता था कि मैं ज्यादा नहीं पढ़ पाऊँगा लेकिन मैं कुछ नहीं से कुछ के फलसफे पे विश्वास रखता हूँ इसलिए उम्मीद थी ३०-३५ पेज भी पूरी मीट के दौरान पढ़े तो फायदा ही होगा।

फिर ट्रेन चलने से पहले वो लोग आ गये। अब सब सीट पर थे और ट्रेन के चलने का इन्तजार होने लगा। भारतीय रेल थी तो दस पन्द्रह मिनट लेट चल रही थी। ट्रेन  चलने लगी तो सबसे पहले ये पता किया कि उधर हमारे साथ कौन कौन था। हमारे साथ एक भाई बैठा था और एक मिस पूजा नाम से महिला थीं। उनकी सीट 17 नंबर थी और हमे ये मालूम हुआ कि वो मथुरा से चलने वालीं थी। हम अपना प्रोग्राम उससे पहले ही निपटाना चाहते  थे।  ट्रेन चलने के कुछ देर बाद प्रोग्राम चालू हुआ। हमने कोल्ड ड्रिंक्स और नमकीन वगेरह खोली हुई थी। एक बार सिपाही भी चेक करने आया लेकिन जब उसे कुछ न मिला तो चले गया।

जब टी टी चेक करने आया तो उसने ही बताया कि पूजा जी मथुरा से नहीं दिल्ली से चढ़ने वाली थीं। अब चूँकि वो नहीं चढ़ी थी तो वो वाली बर्थ खाली थी। हमारी एक साइड अप्पर बर्थ थी जिसके बदले हमने 17 नुम्बर वाली बर्थ एक्सचेंज करने की सोची। अब प्रोग्राम अपने जलाल पर था। तेज आवाज़ में बातें हो रही थी और बातों की जलेबियाँ छन रही थीं। बीच में एक दो साथ भी बेकाबू हुए लेकिन ज्यादातर सब नियंत्रण में ही रहा। एक बार बात गर्म होती लगी भी लेकिन फिर संभाल ली गयी।

थोड़े वक्त में प्रोग्राम खत्म हुआ तो खाने की योजना बनी। खाने में योगी भाई और दीपक भाई शाकाहारी थे  और हम तीन माँसाहारी। इसी हिसाब से खाने को पैक भी किया गया था। खाना खुला तो कुलदीप भाई ने बताया कि होटल वाले ने मिस्सी रोटी की जगह साधारण रोटी रख दी थी। वो थोड़ा नाराज तो हुए लेकिन अब किया क्या जा सकता था। स्टेशन के किनारे मौजूद खाने वाले ये सब काम करते ही हैं। लोग बाग़ चूँकि जल्दी में होते हैं तो उन्हें शोर्ट चेंज देना, कुछ के बदले कुछ देना और ऐसे ही छोटे मोटी धांधली करना उनके दिनचर्या का हिस्सा होता है। यात्री सचेत रहकर ही अपना नुक्सान होने से बचा सकता है।

खैर हमने खाने के अलग अलग हिस्से किये। खाने में रोटी, दाल और एक पनीर की सब्जी थी।  शाकाहारी वालों के लिए फ्राइड राइस और मांसाहारी लोगों के लिए बिरयानी थी। खाना स्वादिष्ट था तो रोटी वाला किस्सा जल्द ही भुला दिया गया।  इस दौरान बातचीत का सिलसिला चलता रहा। बातचीत का रुख उपन्यासों  विशेषकर पाठक साहब के उपन्यास , संगीत और फिल्मों की तरफ रहा। बातों की जलेबियाँ छनते छनते काफी वक्त हो गया था।

 मस्ती के कुछ पल: योगी भाई, दीपक भाई, कुलदीप भाई, अल्मास भाई और मैं

धीरे धीरे सबको नींद आने लगी तो सब अपनी अपनी बर्थ लेट गये। अब सुबह होने का इन्तजार था। हमे सुबह उदयपुर पहुँचना था जिधर से माउंट आबू जाने के लिए कुछ जुगाड़ लगाना था। ये काम करने के लिए अनुभवी लोग थे। लेकिन ये बात तय थी आगे आने वाले दिन बहुत ही मज़ेदार और रोचक होने वाले थे।

यही सब सोचते हुए मुझे कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला।

क्रमशः

पूरी ट्रिप के लिंकस
माउंट आबू मीट #१: शुक्रवार का सफ़र
माउंट आबू मीट #२ : उदय पुर से होटल सवेरा तक
माउंट आबू  #3 (शनिवार): नक्की झील, टोड रोक और बोटिंग
माउंट आबू #4: सनसेट पॉइंट, वैली वाक
माउंट आबू मीट #5: रात की महफ़िल
माउंट आबू मीट #6 : अचलेश्वर महादेव मंदिर और आस पास के पॉइंट्स
माउंट आबू #7:गुरुशिखर
माउंट आबू मीट #8: दिलवाड़ा के मंदिर, होटल में वापसी,दाल बाटी  की पार्टी 
माउंट आबू मीट #9: होटल भाग्यलक्ष्मी और वापसी के ट्रेन का सफ़र

About विकास नैनवाल 'अंजान'

मैं एक लेखक और अनुवादक हूँ। फिलहाल हरियाणा के गुरुग्राम में रहता हूँ। मैं अधिकतर हिंदी में लिखता हूँ और अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी करता हूँ। मेरी पहली कहानी 'कुर्सीधार' उत्तरांचल पत्रिका में 2018 में प्रकाशित हुई थी। मैं मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी नाम के कस्बे के रहने वाला हूँ। दुईबात इंटरनेट में मौजूद मेरा एक अपना छोटा सा कोना है जहाँ आप मेरी रचनाओं को पढ़ सकते हैं और मेरी प्रकाशित होने वाली रचनाओं के विषय में जान सकते हैं।

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