झाँसी और ओरछा की घुमक्कड़ी #1: दिल्ली से झाँसी

झाँसी ओरछा की घुमक्कड़ी
2 दिसम्बर 2018  की शाम से 3 दिसम्बर 2018  की सुबह तक 

रूम से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन:

प्ले देखने के बाद मैं रूम में पहुँच गया था। उधर से आठ बजे करीब निकला था। अभी मेरा सफ़र खत्म नहीं हुआ था। अभी एक नये सफर पर निकलना था। मैं रूम में पहुँचा और नहाया। मैं अभी निश्चिन्त था। पहले मुझे जल्द ही निकलना था चूँकि मेरी ट्रेन नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से पौने बारह की थी लेकिन शाम को मुझे एक सन्देश मिला था कि ट्रेन लेट हो गई थी और अब ट्रेन ने सुबह के तीन बजे उधर से निकलना था। यानी अब मैं रूम से साढ़े नौ पौने दस बजे तक भी निकल सकता था। आकर नहाने में और नहाकर तैयार होने में नौ बज ही गये थे। फिर खाने पीने में साढ़े नौ बज गये और पौने दस बजे करीब मैं रूम से निकला।तीन बजे तक वक्त मुझे उधर काटना था। एक पल को तो मन में ख्याल आया कि राकेश भाई को टिकेट कैंसिल करने को कहता हूँ लेकिन फिर सोचा कि नहीं झाँसी ओरछा देखने का मन था तो ये काम कर ही लिया जाए। यह सोच कर मन पक्का कर दिया था। मैंने अपने साथ दो किताबें रखी थी। मैंने सोचा था कि उधर जाकर कुछ न कुछ पढ़ ही लूँगा। यही सोचते हुए पहले ऑटो लेकर गुरुग्राम बस स्टैंड पहुँचा और उसके पश्चात उधर से ऑटो लेकर एम जी रोड मेट्रो स्टेशन पहुँचा। उधर मुझे भीड़ मिलने के आसार थे लेकिन उम्मीद से कम ही भीड़ मुझे मिली। चलो एक बात तो अच्छी हुई थी। मैं जल्द ही प्लेटफार्म तक पहुँच गया और कुछ ही देर में मैं मेट्रो में चढ़कर एक कोने में दुबका हुआ जॉर्ज आर आर मार्टिन के उपन्यास फेवर ड्रीम के पन्नों में खोया हुआ था। एबनर मार्श अपनी सपनों की नाव तैयार कर चुका था और उसने उसका नाम फेवर ड्रीम रखा था। अब वो उसके मालिक के साथ एक यात्रा पर जाने के लिए तैयार था। मैंने पढ़ने लगा और कथानक में इतना खो गया कि पता ही नहीं चला कि  कब नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन आ गया।

मैं मेट्रो स्टेशन से उतरा और रेलवे स्टेशन की तरफ गया। मेट्रो स्टेशन के गेट से निकलते ही आप नई दिल्ली दिल्ली रेलवे स्टेशन के समक्ष खड़े हो जाते हो।  मैंने एक दो फोटो स्टेशन के लिए और अंदर दाखिल होने को था कि सामने एक रेस्टोरेंट  दिखा जिसके बाहर कुछ लोग कप लेकर खड़े थे और कुछ चीज चुसक रहे थे। उन्हें देखकर मेरा चाय का मन बोल गया और मैं रेलवे के उसे रेस्टोरेंट की तरफ बढ़ा। उधर जाकर मैंने एक चाय का आर्डर दिया।

जब तक चाय आती तब तक मैं इधर उधर नज़र घुमा रहा था। ऐसे में उसी कैफ़े की दीवार पर एक नोटिस दिखा कि उधर से 110 रूपये में कम्बल मिल रहा था। मेरे मन में जिज्ञासा जागी कि ऐसा कौन सा कम्बल है लेकिन फिर दो तीन लोगों को एक ही तरह का कम्बल ओढ़े देखा तो ध्यान आया कि ऐसा कम्बल एक मेरे पास भी पड़ा था। मेरे किसी रूम मेट का था। इधर उधर ले जाने के लिए काफी सही रहता था क्योकि हल्का रहता था। मैंने सोचा क्यों न एक ले लूँ लेकिन फ़िलहाल के लिए तो चादर और हुड मैंने रखा हुआ था। कुछ किताबें भी थी और कुछ कपड़े भी थे। अभी से मैं बैग भारी नहीं करना चाहता था। फिर एक उम्मीद ये भी थी कि अभी अंदर काफी वक्त काटना था और उसका एक तरीका अन्दर मौजूद स्टाल्स में जाकर पुस्तकें देखना था। उधर कुछ किताबें मिल जातीं तो उन्हें भी रखने की जगह चाहिए थी। यह सब सोचा और निर्णय लिया कि अभी कम्बल लेना सही निर्णय नहीं था। वापसी में अगर मौक़ा लगा तो जरूर एक कम्बल ले लूँगा।

यह सब सोच ही रहा था कि मेरी चाय आ गई और मैं चाय लेकर उसकी चुस्कियाँ भरने लगा। अभी अन्दर घुसने में काफी वक्त था। अन्दर जाकर भी कौन सा कुछ करना ही था। मैंने आराम से चाय पी सकता था।

अँधेरी रातों में एक साया निकलता है 

भैया जी स्माइल

पहुँच गये भैया नई दिल्ली

स्टेशन में ट्रेन का इंतजार

मैंने एक कप चाय को जितनी देर चला सकता था चलाया और जब वो खत्म हो गया तो कप को कूड़ेदान के हवाले करके अन्दर की ओर बढ़ गया।

गेट में सामान चेक करने वाली मशीन काम नहीं कर रही थी। बैग चेक करने के नाम पर खानापूर्ति हो रही थी। मैं बढ़ा तो किसी ने मुझे रोका टोका भी नहीं। मैं सोचने लगा कि एक मर्डर मिस्ट्री या अपराध साहित्य से जुड़े उपन्यास का प्लाट इसमें आसानी से बन सकता है लेकिन फिर मेरी नज़र सामने मौजूद स्टाल पर गई और मैं अपने विचारों की कड़ियों को त्याग कर उस तरफ खिंचता चला गया। उधर मैंने कुछ किताबें देखीं। मैं विशेषकर राज भारती की प्रेत मण्डली ढूँढ रहा था। इसके चक्कर में मैं सुबह दरियागंज(इधर क्लिक करके उस यात्रा के विषय में जान सकते हैं) भी गया था और सोलह ऐसी किताबें ले आया था जिनको लेने का मेरा कोई इरादा नहीं था। स्टाल पर तो मुझे प्रेत मण्डली नहीं दिखी और फिर मैं आगे बढ़ गया।

मैंने देखा कि मेरी गाड़ी छः नंबर प्लेटफार्म पर आनी थी। मैं उधर उतरा। ट्रेन का तय वक्त यानी पौने बारह बज ही रहे थे लेकिन ट्रेन तो काफी देर से आनी थी। बगल वाले प्लेटफार्म पर एक गाड़ी खड़ी थी जो कि कुछ ही देर में चलने लगी। उसको गये कुछ ही मिनट गुजरे थे कि एक आदमी और एक लड़का भागते हुए आये।

उन्होंने मुझसे पूछा – “भाई साहब! इधर से(प्लेटफार्म की तरफ इशारा करके) जो गाड़ी जानी थी वो चली गई क्या? (उन्होंने कुछ नाम लिया था वो मुझे याद नहीं लेकिन प्लेटफार्म की इशारा करके बताया था)?”
मैं- “हाँ अभी कुछ देर पहले ही गई।”
“ओह!” वो बस यही कह पाये।

उनके चेहरे पर हताशा दिखने लगी और वो आगे बढ़ गये। अब न जाने उनका क्या इरादा था। वो जब मुझसे बात कर रहे थे तो मुझे उनके मुँह से हल्की सी शराब की बदबू आई थी। शायद घूँट लगाने के चक्कर में ही गाड़ी छूटी थी। अगर अब वापस घर जाते तो शर्तिया उनकी श्रीमती जी को अगले कुछ सालों के लिए उनकी लापरवाही के ऊपर उन्हें टोकने का मसाला मिल जाता। मैं सोचने लगा कि बेचारे बुरे फँसे। लेकिन सिचुएशन जो दिमाग में आई थी वो थोड़ा मजेदार भी थी। मैने आजतक फिल्मों में ही गाड़ी छूटते हुए देखा था, आज असलियत में देखने का पहला अनुभव था। वरना मुझे लगता था कि गाड़ी छूटना एक प्लाट पॉइंट ही होता है।

खैर, वो तो चले गये थे तो मैं भी आगे बढ़ने लगा। मैं थोड़ा आगे ही बढ़ा था कि दो व्यक्ति मुझसे मिले। एक ने पूछा  – “ये पौने बारह बजे वाली ट्रेन निकल गई क्या?”
मैं – “नहीं वो लेट आएगी। आई नहीं अभी तक।”
 वो – “नहीं नहीं जो पौने बारह बजे आती है न। झाँसी जाती है। वो वाली।”
मैं-“उसी की बात कर रहा हूँ। वो आज तीन बजे निकलेगी।”
वो – “ओह! अच्छा कोई और ट्रेन है क्या? कुछ देखकर बता दोगे।”, उस भाई ने मेरे हाथ में फोन देखकर कहा। मैंने फोन खोला और उसमें डाटा फीड किया। कुछ ट्रेन्स के नाम और उनके आने का वक्त उन्हें बताया। उन्होंने वो नोट किया और मुझे धन्यवाद देते और आपस में विचार विमर्श करते हुए आगे की ओर बढ़ गये।

मैं उधर खड़ा खड़ा बोर हो रहा था तो मैं दोबारा एक नम्बर प्लेटफार्म की तरफ बढ़ गया। मेरा इरादा चाय की चुस्की मारने का था। एक डर ये भी था कि मैं उधर ज्यादा देर तक रहूँगा तो इन्क्वायरी काउंटर बनकर रह जाऊँगा जहाँ हर कोई भूला भटका अपनी जिज्ञासा की शांति के लिए आएगा और मुझे बिना तनख्वाह के यह काम करना पड़ेगा। कई बार राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर भी ऐसा होता है। आप खड़े हो जाओ तो लोग आ आकर आपसे पूछने लगते हैं। ऐसे ऐसे स्टेशन के नाम कि एक बार के लिए आप भी संशय में पड़ जाओ। अक्सर मैं जब किसी से पूछता हूँ तो आखिरी के स्टेशन का नाम लेकर पूछता हूँ क्योंकि इससे बताने वाले को आसानी होती है। बीच के स्टेशन के नाम लेकर जवाब शायद तभी मिले जब वो उस रूट पर जाता हो। लेकिन आखिरी के स्टेशन के विषय में जानकारी सभी को होती है।

खैर, मैं एक नंबर प्लेटफार्म पर पहुँचा और उस रेस्टोरेंट तक गया जहाँ से चाय की उम्मीद थी। छः नम्बर वाले स्टाल में कोल्ड ड्रिक, नमकीन वगेरह तो थे लेकिन चाय नहीं थी। मैंने एक चाय माँगी और उस बंदे ने मुझे एक कप पकड़ाई। मैंने उसे दस रूपये अदा किये और उधर ही मौजूद कुछ टेबल्स(जहाँ खड़े होकर यात्री अपना खाना खा सकते थे) पर चला गया। मैंने  एक घूँट भरा ही था कि स्वाद कुछ अलग सा लगा। भाई, ने चाय की जगह कॉफ़ी दे दी थी। अब मैंने एक घूँट पी लिया था और मैं कॉफ़ी की चुस्कियाँ लेने लगा। वैसे मैं कॉफ़ी कम ही पीता हूँ। कॉफ़ी पीने के बाद मैंने हर एक प्लेटफार्म का चक्कर मारने की सोची। मेरा इरादा था कि ऐसे में टाइम पास भी हो जायेगा और अगर कोई व्हीलर वाला खुला होगा तो कुछ किताबें भी देख लूँगा। वैसे भी तीन बजे तक का वक्त काटना था।

मैंने कॉफ़ी खत्म की और अपनी योजना पर अमल शुरू कर दिया। एक नम्बर प्लेटफार्म को तो देख चुका था। अब दो नंबर,फिर तीन,चार ऐसे ही सब जगह फिरने लगा। मैं आठ नंबर प्लेटफार्म पर पहुँचा तो मुझे चाय वाला दिख गया। चाय डिप वाली थी लेकिन डूबते को तो तिनके का सहारा भी काफी होता है।

मैंने एक चाय ली और एक एक घूँट पीने लगा। चाय खत्म करके मैं थोड़ी देर उधर ही मौजूद एक बेंच पर बैठ गया और मैंने पाठक साहब का उपन्यास बिचौलिया निकालकर उसे पढ़ने लगा। मैंने लेखकीय से शुरुआत की ज्सिमें पाठक साहब ने अपनी पिछले उपन्यासों के विषय में पाठको की राय छापी थी। इसके अलावा रमाकांत की भाषा कैसे बनी इस पर भी लिखा है। उर्दू और पंजाब के सम्बन्ध पर भी इधर लिखा है। रोचक लेख था और मैं लेखकीय के वो चार पृष्ठ पढकर ही उठा।

अब मेरे पैर पर फिर खुजली होने लगी। मैंने सोचा कि जब बैठकर पढ़ना ही है तो क्यों न जिस प्लेटफार्म पर मेरी गाड़ी आनी है उस पर जगह ढूँढकर पढूँ। यह सोचकर मैं उठा और छः नम्बर प्लेटफार्म की तरफ बढ़ने लगा। इसी दौरान प्लेटफार्म की सफाई होने लगी थी और सीढ़ियों, ओवरब्रिज इत्यादि पर सफाई कर्मचारी पानी की धार मार रहे थे। इससे पहले मैं इस प्रक्रिया के बीच में फंसता मैं अपने प्लेटफार्म तक पहुँचाना चाहता था। लेकिन मैं असफल हुआ। मैं सीढ़ियों तक पहुँचा तो उससे पानी गिर रहा था। एक भाई ऊपर सफाई कर रहे थे। मैं उधर से वापिस मुड़ा और आगे दूसरे ओवरब्रिज की तरफ बढ़ने लगा। उधर खाली था तो झट से उधर से चढ़कर अपने प्लेटफार्म तक पहुँचा।

मेरी ट्रेन पुडूचेरी एक्सप्रेस थी इसलिए प्लेटफार्म पर दक्षिण भारतीय लोग ज्यादा दिख रहे थे। रहरहकर मेरे कानों में उनकी भाषा के टुकड़े आ जाते थे। प्लेटफार्म भरा हुआ था क्योंकि कई लोगों ने लम्बी यात्रा करनी थी। मैं घूम घूम कर अपने लिए एक जगह देखने लगा। और एक बेंच पर जगह मिलते ही मैं उसमें बैठ गया। मैं अब बैठकर पढ़ने लगा।

मैं  किताबों के पृष्ठों में खोया हुआ था कि पास बैठा एक व्यक्ति ट्रेन के लेट होने को गरियाने लगा। मैंने उसका साथ दिया। वो लड़का ही था। उसने बोला कि अब देखिये इतना लेट हो गई। अगर किसी को कोई इमरजेंसी होगी तो क्या करेगा। मैंने हाँ में हाँ मिलाई। फिर उसने कुछ रुककर बोला – “अच्छा मैं थोड़ा लगा रहा हूँ। आपको कोई दिक्कत तो नही है न?” मैंने कहा-“नहीं।” तो उसके चेहरे पर राहत के भाव आये। उसने एक बोतल खोली, एक नमकीन का पैकेट खोला और अपने में मस्त हो गया। मैंने कुछ पृष्ठ और पढ़े। मैंने सोचा कि अब एक बार इस पर नशा तारी हो जायेगा तो ये और वाचाल बन जायेगा। फिर इसे झेलना मुश्किल होगा। यह सोचकर मैंने अपनी जगह से उठने की सोची और कोई और जगह पकड़ने की सोचकर मैं उठ गया। वो मदिरापान में व्यस्त था तो उसका ध्यान मेरी तरफ नहीं गया। मेरा डिब्बा एस2 था और बोर्ड पर इंडिकेटर दिख ही रहा था। मैंने सोचा क्यों न उसी जगह जाऊँ जहाँ पर मेरा डिब्बा आएगा।

मैं एसटू वाले इंडिकेटर की तरफ बढ़ने लगा। वहाँ पहुँचा तो वो सीढ़ी के नजदीक था। उधर चादर डालकर काफी लोग लेटे हुए थे। कुछ लोग खड़े थे, कुछ लोग इधर उधर चहलकदमी कर रहे थे। कुछ लोग सीढ़ियों से अब उतर रहे थे। वहीं पर एक नमकीन वाला मौजूद था। मैं उस तक पहुँचा और मैंने उससे छोटा वाला मूंगदाल नमकीन देने को कहा।

वो बीस वाला पकड़ाने लगा तो मैंने उससे कहा-“छोटा वाला चाहिए।”
“नहीं है” उस भाई ने जवाब उछाला।
“वो क्या है?” मैंने उसे छोटा वाला पैकेट दर्शाता हुआ पूछा।
उसने उस दिशा में देखा तो उसे छोटा पैकेट दिखा-“पन्द्रह रूपये!”उसने कहा।

मैंने पैकेट लिए, पैसे दिए और कोने में खड़ा हो गया। बेंच आसपास कहीं कोई खाली नहीं दिख रही थी। मैंने किताब जेब में डाली और उधर ही नमकीन खाने लगा। दस पंद्रह मिनट तक ऐसे ही रहा। फिर एक और वाक्या हुआ।

उधर एक सफाई वाले भाई सफाई कर रहे थे। वो सफाई करके आगे बढे ही थे कि कोई पीछे से बोला ये भी साफ कर दो। वो मुड़े तो उधर एक नमकीन का पैकेट गिरा था। जिस व्यक्ति ने बोला था उसने जमीन पर बिस्तर लगा रखा था जिसके पास ही वो पैकेट गिरा था। पैकेट किसने डाला था ये कहना मुहाल था। सफाई वाले भाई के चेहरे पर खीज साफ नुमाया हो रही थी।
“मैं इधर साफ करता हूँ तो कोई उधर गिरा देता है। उधर जाओ तो इधर गिरा देता है। पागल बनाकर रखा हुआ है” वो बोले।
जिसने बोला था उसने चुपचाप अपनी मुंडी उस कम्बल के अन्दर डाल दी जो वो ओढ़े हुए था।
सफाई वाले भाई ने उधर जाकर उस पैकेट को उठाकर कूड़े में डाला। फिर इससे पहले कोई और आवाज़ लगाता उधर से निकल गये।

उनका कहना सही था। रेलवे स्टेशन में कूड़ेदान बने हुए थे लेकिन लोगों को आदत थी कि जहाँ पर खायेंगे उधर ही डाल देंगे। फिर देश को गंदे होने पर गरियाएंगे। ये भूल जायेंगे कि देश गंदा नहीं होता है। देशवासी होते हैं। वो उधर से निकले। मेरा नमकीन का पैकेट भी खत्म हो गया था। मैंने उसे कूड़े दान में डाला और फिर किसी बेंच की तलाश में आगे बढ़ गया। ट्रेन आने में आधा पौना घंटा बचा था। मैं इतनी देर में कुछ पृष्ठ पढ़ना चाहता था। मुझे एक जगह नसीब हुई तो उधर बैठ गया और उपन्यास की शुरुआत कर दी।

सुनील चक्रवर्ती से मिलने अदिति अटवाल नाम की लड़की आई थी। वो मुसीबत जदा थी और चाहती थी कि सुनील उसकी मदद करे। तीस चालीस पन्ने पलटे थे कि ट्रेन के आने का वक्त हो गया। अचानक से प्लेटफार्म सक्रिय सा दिखने लगा। लोग सामान बाँधने लगे। अपना बिस्तरा समेटने लगे।

मैंने भी किताब को बैग में डाला और खड़ा हो गया। मैं उस तरफ बढ़ा जिधर एस टू दिखा रहा था और खड़ा हो गया। दस पंद्रह मिनट के इन्तजार के बाद ट्रेन आती दिखी। सबके के चेहरे पर राहत के भाव आये।

बोर्ड है यानी सही जगह हैं

ट्रेन का आना और झाँसी तक का सफ़र 

लेकिन ट्रेन के आते ही वो भाव थोड़ा बदल भी गये। सब इंडिकेटर के हिसाब से अपनी अपनी जगह पर थे लेकिन ट्रेन इस तरह आई थी कि सारा हिसाब गड़बड़ा गया था। शायद वो भी ट्रेन के सफ़र के मामले में मेरी ही तरह नौसीखिए थे।

मैं अब आगे बढ़ने लगा क्योंकि मुझे इतना तो पता चल गया था कि मेरा डिब्बा इधर नहीं आएगा। चलते हुए मैं अपने डिब्बे के नजदीक पहुँच ही गया।  ट्रेन के रुकने से भी पहले लोग गेट पर मौजूद थे। ट्रेन रुकी तो पता चला कि बोगियों में घुसने वाले गेट बंद हैं। शायद अन्दर से बंद किये हुए थे। अब मैं भी अपने डिब्बे के नजदीक वाले गेट में मौजूद था।

ट्रेन के डिब्बों का गेट बंद देखकर लोगों की भारतीयता फूट पड़ी। एक व्यक्ति बारबार ट्रेन का हैंडल घुमाने लगा। हर बार असफलता मिलती लेकिन वो किसी नई उम्मीद के आधीन होकर गेट का हैंडल घुमाते रहता। एक दूसरा शूरवीर खिड़की खोलने की जुगत लगाने लगा। उसका इरादा शायद खिड़की से अन्दर दाखिल होने का था। मुझे ये समझ नहीं आ रहा था कि अब ट्रेन आ गई थी तो यात्रियों को लेकर ही जाती। ऐसा तो था नहीं कि आरक्षित सीट पर कोई और बैठ जाता या किसी दूसरे की सीट पर आप जल्दी घुसकर अधिकार जमा देते। और फिर ट्रेन ने चलना यात्रियों को लेकर ही चलना था। यह सब बातें उन भाई साहब को भी कही जो हैंडल से कुश्ती लड़ रहे थे लेकिन उनपर इसका असर नहीं हुआ। खिड़की के साथ धींगा मुश्ती करने वाला व्यक्ति भी हार मानने को तैयार नहीं था। उनके जैसे कई लोग ट्रेन के साथ तिकड़म लगाकर गेट खोलने के फिराक में थे। इन्हें देखकर मेरे मन में ख्याल आया कि अगर अभी हम लोग मर जाते हैं और हम सबको नरक मिलता है तो इनके लिए यही सबसे बड़ा नरक होगा कि अनंत काल तक ये ऐसे ही किसी ट्रेन के साथ तिकड़में लड़ा रहे हैं लेकिन इन्हें सफलता हासिल नहीं होती है। इनके लिए गेट हमेशा बंद ही रहता है जबकि इनके काफी बाद आने वाले लोग इनसे पहले ट्रेन के अन्दर दाखिल हो जाते हैं। अपने इन्हीं ख्यालो से मुझे हँसी सी आ गई। मैंने झट से हँसी पर काबू किया और आस पास देखा। किसी का ध्यान मेरे ऊपर नहीं था। कम से कम मुझे तो ऐसा लग रहा था। तभी गेट भी खुल गया और हम लोग अंदर दाखिल हो गये।

मेरी सीट 3 नम्बर थी और मैं जल्द ही उस तक पहुँच गया था। मुझे नींद आ रही थी। मैं पहले टॉयलेट गया और फिर आकर अपनी अप्पर बर्थ पर चढ़ गया। मैंने सैंडल और बैग से तकिया बनाया। अपने बैग से चादर पहले ही निकाल चुका था। इन सब कामों में मुझे मुश्किल से पाँच से दस मिनट लगे होंगे। नीचे एक अधेड़ जोड़ा था। मेरे बगल वाले अप्पर बर्थ में एक युवक था। मैंने इन सब पर सरसरी निगाह मारी। सभी ट्रेन का इन्तजार करते करते थक गये थे। अब मेरा केवल एक ही इरादा था; सोने का और यही काम मैंने किया।

कई दिनों से झाँसी और ओरछा जाने की सोच रहा था। आज यह काम होने वाला था। यह सोचकर मैं खुश था। मुझे नींद कब आ गई पता भी नहीं लगा।

सुबह पहले छः बजे करीब नींद खुली थी। बाथरूम आ रहा था तो उधर गया। फिर लेट गया। फिर आठ बजे करीब नींद खुली। गूगल पर देखा तो झाँसी कुछ दूर था। नीचे से चाय वाले भाई गुजर रहे थे तो उनसे चाय मँगवा ली और वो चुस्कने लगा। फिर उतरा और एक और बात बाथरूम गया। नीचे जो अधेड़ दम्पति थे वो भी उठ गये थे। वहां का चार्जिंग पोर्ट खाली था तो मैंने उधर अपना फोन लगा लिया।

रात को राकेश भाई का संदेश आया था। वो स्टेशन से साढ़े तीन किलोमीटर दूर एक होटल में रुके थे। कचहरी चौराहा नाम की जगह थी। उन्होंने कहा था कि स्टेशन से उधर ही आऊँ और फिर उधर से फ्रेश होकर हम झाँसी और ओरछा भ्रमण के लिए निकलते। उस वक्त मुझे वो आईडिया सही लगा तो मैंने हाँ बोल दिया।

राकेश भाई अपने गाँव,जो कि नालंदा में है,से बाइक चलाकर आये थे। उन्होंने 870 किलोमीटर का सफ़र तय किया था। इसलिए शायद आज देर तक सोये रहे थे। लाजमी भी था। सुबह नौ बजे के करीब उनका मेसेज आया कि मैं किधर हूँ। मैंने गूगल बाबा से पूछा तो अभी भी सात किलोमीटर दूर दिखा रहा था। उन्हें बताया। फिर दोबारा होटल जाने की बात हुई। उन्होंने अपने होटल की लोकेशन मैप में रात को ही भेज दी थी। मैंने उसे सेव करके रख लिया था। उतर कर ही होटल के लिए निकल सकता था।  मैं फोन चार्जिंग पर रहने दिया और  बिचौलिया के कुछ पृष्ठ पढ़ने लगा। कुछ ही पृष्ठ पढ़े होंगे कि हमारा स्टेशन आता सा लगा।

अधेड़ दम्पति भी सामान बटोरने लगे थे। ट्रेन रुकी भी नहीं थी कि वो गेट तक पहुँचना चाहते थे। मुझे इसकी कोई जल्दी नहीं थी। जब तक ट्रेन नहीं रुकी तब तक मैं पढ़ता रहा। फिर बैग उठाया,किताब बैग में डाली और झाँसी स्टेशन पर उतरा।

उतरकर  मैंने घर मम्मी को फोन लगाकर बताया कि झाँसी पहुँच चुका हूँ। फिर थोड़ी देर बात करके फोन काट दिया।

मैंने इधर उधर नज़र घुमाई। एक स्टाल पर काफी भीड़ थी। चाय मिल रही थी तो मैं उधर की तरफ बढ़ा। भीड़ ज्यादा थी और चाय देने वाला एक ही व्यक्ति था। ऐसे में दस मिनट तक इन्तजार करना पड़ा। तब तक मैंने झाँसी किले के विषय में देखा तो पाया कि वो नजदीक ही था। इसी से मेरे दिमाग में एक ख्याल आया। मैंने राकेश भाई को फोन करके कहा कि मैं इधर ही फ्रेश हो लेता हूँ। वो भी इधर ही आ  जायें। फिर साथ में हम नाश्ता कर लेंगे। पहले मैं उधर आउंगा,फिर हम निकलेंगे तो उसमे वक्त ज़ाया होगा। उन्हें भी यह बात वाजिब लगी और वो आने को तैयार होने लगे। ठंड का मौसम था और एक दिन बिना नहाये रहा जा सकता था। तब तक मुझे चाय मिल गई थी तो मैंने चाय पीनी शुरु की।

चाय खत्म की और किसी बुक स्टाल को तलाशने लगा। एक बुक स्टाल दिखा, उधर राज भारती की प्रेत मण्डली के विषय में पूछा। वो नहीं मिली तो दूसरी की तरफ गया। प्रेत मण्डली दूसरे स्टाल पर भी नहीं थी लेकिन कुछ और उपन्यास थे। वो देखते हुए स्टाल वाले भाई से बात होने लगी।
वो कहने लगे- “अब नये उपन्यास आते ही किधर हैं।”
मैं- “वो तो हैं। पाठक साहब साल में एक दो लिखते हैं।”
“अनिल मोहन तो लिखते नहीं। उनके पुराने ही उपन्यास आते हैं।”, उन्होंने कहा।
“सही कहा।”,मैं बोला,”और वेद प्रकाश जी गुजर गये हैं।”, मैंने बात आगे बढ़ाई”
उन्होंने हामी भरी और फिर कहा- “वेद जी ने शगुन शर्मा को बनाने की कोशिश की थी लेकिन वो उतने सफल नहीं हुए।”
मैंने हामी भरी। मैंने शगुन शर्मा को आजतक नहीं पढ़ा था। मैंने उनसे कहा – “आप नये लेखको के उपन्यास  नहीं रखते।” वो इस बात से अनजान थे। उनके चेहरे पर हैरत देखकर मैंने अपनी बात में इजाफा किया -“आजकल इकराम फरीदी जी  और कंवल शर्मा जी लिख रहे हैं।”
उन्होने हैरत जताई। फिर पूछा- “किस प्रकाशन से आ रहे हैं?”
मैं- “रवि पॉकेट बुक्स से।”
उन्होंने एक नोटबुक में ये नोट किया। तब तक मैंने दो उपन्यास चुन लिए थे। एक टाइगर का मिशन आश्रम वाले बाबा था। और दूसरा अनिल मोहन का आतंक का पहाड़ था। टाइगर का मैंने आजतक केवल एक ही उपन्यास इच्छाधारी अम्मा पढ़ा है। अनिल मोहन जी के तो काफी उपन्यास पढ़ चुका हूँ। यह मिशन आश्रम वाले बाबा का प्रकाशन काफी समय से अटका हुआ था। इसलिए इसको पढ़ने में रूचि थी। पहले सोचा राज वालों की साईट से मँगवाऊँगा लेकिन जब इधर मिल रहा था तो ले ही लिया। मैंने दोनों के 230 रूपये अदा किये और उपन्यास बैग में डाले। अब फ्रेश होना था।

आगे का काम उसके बाद होता। इधर भी एक रोचक किस्सा हुआ। अब चूँकि पोस्ट बढ़ी हो गई है तो उस किस्से को अगली पोस्ट में बताऊँगा। तब तक के लिए आज्ञा दीजिये।

झाँसी स्टेशन से लिए उपन्यास

#पढ़ते_रहिये_घूमते_रहिये
#फक्कड़_घुमक्कड़

क्रमशः

झाँसी और ओरछा की घुमक्कड़ी की सभी कड़ियाँ:
दिल्ली से झाँसी
झाँसी रेलवे स्टेशन से किले की ओर

© विकास नैनवाल ‘अंजान’

About विकास नैनवाल 'अंजान'

मैं एक लेखक और अनुवादक हूँ। फिलहाल हरियाणा के गुरुग्राम में रहता हूँ। मैं अधिकतर हिंदी में लिखता हूँ और अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी करता हूँ। मेरी पहली कहानी 'कुर्सीधार' उत्तरांचल पत्रिका में 2018 में प्रकाशित हुई थी। मैं मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी नाम के कस्बे के रहने वाला हूँ। दुईबात इंटरनेट में मौजूद मेरा एक अपना छोटा सा कोना है जहाँ आप मेरी रचनाओं को पढ़ सकते हैं और मेरी प्रकाशित होने वाली रचनाओं के विषय में जान सकते हैं।

View all posts by विकास नैनवाल 'अंजान' →

9 Comments on “झाँसी और ओरछा की घुमक्कड़ी #1: दिल्ली से झाँसी”

  1. वाह वाह!!इस बार इतनी जल्दी कैसे लिख दिए?मैं तो सोच रहा था ये वृतांत अगले साल ही आएगा🤣.. वैसे मैं लगभग 700 किमी नहीं पूरे 870 किमी बाइक चलाकर आया था..

  2. पीछे का लिखने के चक्कर में आगे वाला छूट जाता है। इसलिए सोचा है कि अब से सबसे ताज़ी घुमक्क्ड़ी को लिख दिया करूँगा। बैकलोग धीरे धीरे क्लियर करता रहूँगा।
    ब्लॉग में दूरी संशोधित कर दी गई है।
    शुक्रिया।

  3. चाय और किताब उपन्यास आपके अंधेरी रातो के साये के लिए हमेशा जरूरी है…कितनी बार चाय पी ली आपने…चलो झांसी तो पहुचे जैसे तैसे…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *