कठलौं: एक छोटी सी यात्रा

कठलौं: एक छोटी सी यात्रा
19 जून 2020, शुक्रवार को यह यात्रा की गयी
 
कठलौ
ऊपर से दिखता कठलौ(दायें), कठलौ(बायें )
चलो कठलौ चलें:
कोरोना काल में घर में रह रह कर  मैं ऊब सा गया था। हाँ, इस दौरान एक अच्छी बात यह हुई कि मुझे घर आने का मौका मिला और अब कई दिनों से घर में हूँ। वर्क फ्रॉम चल रहा है लेकिन बोरियत भी आने लगी है।
ऐसे में कई दिनों से मेरा कठलौं जाने का विचार बन रहा था। कठलौ घर से नजदीक ही एक धारा है। पहाड़ों में धारा ऐसी जगह होती है जहाँ पानी का प्राकृतिक स्रोत मौजूद रहता है। पूरे साल भर उधर पानी आता रहता है। अक्सर जमीन से फूटकर इधर पानी आता है।
बचपन में जब हमारे घरों में पानी नहीं आता था तो हम बच्चे पानी के जैरकीन लेकर कठलौ पहुँच जाते थे और उधर से पानी भर भर कर लाते थे। कई बार तीन तीन चार चार बार पानी लाना हो जाता था। चढ़ाई चढ़कर पानी लाना एक खेल सरीखा ही हमारे लिए हुआ करता था। पाँच लीटर के डिब्बे से दस और दस के बाद पन्द्रह और फिर दस दस के दो और आखिर में पन्द्रह पन्द्रह के दो डिब्बो को लाने का सफर हमने किया है।
इस बार भी मैं कठलौ जाना चाहता था। एक तो बचपन की याद थी जिसे ताज़ा करना चाहता था और इतने दिनों से जो कहीं घूमने न जाने पाने का मलाल था उसे भी दूर करना चाहता था।
शाम को दफ्तर का काम निपटा तो फिर मैंने घर वालो से बात की और कठलौ जाने का विचार बन गया। मम्मी और बहने भी कठलौ जाने को तैयार थी। एक छोटी मोटी ट्रेकिंग हो ही जाती। वैसे पहाड़ों में रहना का एक फायदा यह तो होता ही है कि ट्रेकिंग का मन करे तो या तो घर से या तो ऊपर की दिशा की तरफ चल पड़ो नहीं तो नीचे की तरफ  चलने लगो। जिधर चलोगे उधर ही ट्रेक हो जाएगी।
सभी को कठलौ जाने की बात पसंद आई और कठलौ जाने की योजना में मम्मी की मुहर लग ही गयी।

कठलौ नहीं जाना है:
शाम के छः बज गये थे। सूरज डूब गया था। मौसम की गर्मी गायब हो गयी थी और शीतल हवा बहने लगी थी। यह मौसम चलने फिरने के लिए उपयुक्त था। हम लोग तैयार हुए। जूते डाले गये और हम लोग अब नीचे जाने के रस्ते पर बढ़ने लगे।
नीचे जाने के रास्ते तक पहुँचने के लिए हमे चाची लोगों के घर से होकर जाना पड़ता है। फिर दो तीन घरों से होते हुए नीचे जाने के लिए बने रास्ते पर बढ़ने लगे। उधर पहुँचे तो पता चला कि मौहल्ले के लोग तो अक्सर शाम को नीचे की तरफ चले ही जाते हैं। यहीं से रास्ता ढाँढरी गाँव की तरफ जाता है तो हमें उधर ही जाना था।
हम लोग इसी रास्ते पर उतरने लगे और इस दौरान हमें हमें मोहल्ले के कई लोग दिखाई दिए जो कि हमारे आज इधर आने पर काफी हैरान थे। वो लोग आजकल रोज ही नीचे की तरफ घूमने चले जाते हैं। एक तरह से ये उनकी इवनिंग वाक का रूट बन गया है। मैंने जाते हुए यही फैसला किया कि  अब तो रोज ही इधर आना होगा।
नीचे जाने के रास्ते में कुछ देर तक तो सीढियाँ आती है लेकिन यह सीढियाँ ज्यादा दूर तक पहुँचती नहीं हैं। सीढियाँ खत्म होते ही चलने वालों को  छोटी छोटी पगदंडियों और खेतों से होते हुए जाना होता है। हम इन पगदंडियों पर सम्भल सम्भल कर चल रहे थे । रास्ते में खेत भी पड़े थे तो मम्मी खेत में काम करने वाली आंटियों से बात चीत करते जा रही थी। ठंडी हवा चल रही थी जो कि हमारे अंदर स्फूर्ति भर रही थी। वहीं मम्मी को यह चिंता भी थी कि बहने और मैं इन रास्तों पर अब चल भी पाएंगे या नहीं। मैं खुद दस पन्द्रह सालों से इधर नहीं आया था। उन्हें लग रहा था कि अब मैदानी हो चुके उनके बच्चे इधर चल भी पायें या नहीं। उन्हें ये भी डर था कि कहीं हमारे पाँव वगैरह इधर फिसल न जायें और हमे चोट न लग जाएँ। मैं चूंकि अक्सर पहाड़ों में घूमने जाता रहता हूँ तो मम्मी को यह दिलासा देता जा रहा  था कि कुछ नहीं होगा।
नीचे की तरफ बढ़ते हुए… आगे आगे मम्मी और पीछे पीछे हम
नीचे दिखता कठलौ, सामने दिखते पहाड़
सीढियाँ खत्म, मुश्किल रास्ता शुरू
सम्भल कर जाना राही
उतरते जाओ उतरते जाओ
जब कठलौ का रास्ता आया तो मम्मी ने कहा- “कठलौ का रास्ता खराब है। उधर जाना खतरनाक होगा। कठलौ नहीं जाना है।”
मैं (हैरान होते हुए)- “हम उधर ही जाने तो आये थे।”
मम्मी – “वो सब मैं नहीं जानती। चलना ही है तो खेत के उस पार चलते हैं। उधर सीढियाँ बनी हुई है। आराम से उतरा जा सकता है। मैं और चाची उधर ही जा जाते हैं घूमने।”
मैं – “पर….”
मम्मी बहनों से – “तुमने जाना है? देख लो… कहीं फिसल विसल न जाओ…”
मैं कातर आँखों से बहनों को देखने लगा लेकिन उनके चेहरे पर मौजूद भाव देखकर मुझे अहसास हो गया था कि ये लोग जाने वाले नहीं है।
मम्मी मेरे तरफ देखते हुए- “फिर उधर ही चल रहे हैं न?”
मैं (गहरी साँस छोड़ते हुए) – “ठीक है। चलो। पहले उधर चलते हैं जहाँ आप जा रहे और फिर वापसी में मैं एक चक्कर कठलौ का मार लूँगा। आप इधर ही रुक जाना।”
मुझे लगा था कि मम्मी मेरा जाना भी कैंसिल न करवा दें लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन्हें यह सुझाव पसंद आया। अब मैं उधर घूम कर आने के पश्चात कठलौं  जा सकता था इसलिए ख़ुशी ख़ुशी हम लोग खेत से दूसरी तरफ बढ़ने  लगे।
एक बार फिर मम्मी रास्ता लीड करते हुए.. चल पड़े हैं खेत की तरफ
बकरी का आतंक:
खेत में एक आंटी खेत में काम रह रहीं थी। उनको मम्मी जानती थी तो उन्होंने थोड़ा उनसे बातचीत की। क्योंकि बहुत सालों बाद उन्होंने हमे देखा था तो उन्होंने हमारे विषय में भी पूछा। जैसा कि अक्सर होता है मेरे सफेद बालों पर भी चर्चा हुई और फिर ऐसे ही थोड़ा इधर उधर की बातचीत के बाद ही हम लोग आगे बढ़ गये। कुछ ही देर में हम सीढ़ियों पर थे। ये रास्ता भी ढाँढरी गाँव की तरफ जाता है। बाद में जब ऊपर आ गये थे तो पापा और मम्मी ने बताया कि नीचे की तरफ सात गाँव हैं जो कि ढाँढरी नाम से जाने जाते हैं। इन सातों ढाँढरियों के नाम क्या हैं यह तो मुझे नहीं पता और घरवालों को भी नहीं पता था लेकिन यह बात मुझे रोचक लगी थी। क्या आप भी ऐसे गाँवों के समूहों का नाम जानते हैं जिनका एक ही तरह का नाम हो?
चलते चलते हम लोग सीढ़ियों में पहुँचे जहाँ से नीचे हम चलने लगे। यह रास्ता काफी आसान था। सीढ़ियाँ कंक्रीट की थी और सीधे गाँव तक जा रही थी। इनमें फिसलने का डर नहीं था और आराम से नीचे चला सकता था। बिना किसी डर के हम लोग नीचे उतरने लगे।
सीढियाँ चलते हुए हमे बगल के जंगल में आग लगी दिखी जिसकी ओर इशारा बहन ने किया। गाँव वाले अक्सर इस आग को लगा देते हैं। चीड़ के सूखे पत्तों जिन्हें पिरूल कहा जाता है उसे गाँव वाले अक्सर आग लगा देते हैं। यह इसलिए किया जाता है ताकि एक तो लोग इन पर फिसले न, ये पत्ते बड़े फिसलनदार होते है और दूसरा यह भी माना जाता है कि अक्सर इनको जलाने के बाद उधर घास उगने लगती है जिससे पशुओं के लिए चारा मिल जाता है। मम्मी ने बताया कि अब गाँव वालों को इन पत्तों को जलाने से रोका जा रहा है क्योंकि इनका प्रयोग अलग अलग चीजों के लिए किया जा रहा है लेकिन फिर भी कई जगह जहाँ इनका प्रयोग नहीं होता है उधर ऐसे ही पारम्परिक तरीके से इससे निजात पाया जाता है।
इस आग की फोटो लेकर हम लोग नीचे की तरफ बढ़ गये। ऐसी ही कई आगों को कुछ दिनों पहले वनाग्नि के तौर पर भी प्रचारित किया जा रहा था। मैं जब गुरुग्राम से पौड़ी आ रहा था कोटद्वार के नजदीक कई ग्रामीणों को इन पत्तों पर आग लगाते हुए मैंने देखा था।
पत्तों के ऊपर बातचीत कर हम लोग नीचे बढ़ते जा रहे थे। नीचे की तरफ बढ़ते  हुए हमे मोहल्ले की कुछ और महिलाएं दिखाई दी। उन्हें नमस्ते करी गयी और मम्मी ने उनसे थोड़ी बातचीत की। वो भी हमे देख हैरान थी। फिर हम लोग आगे बढ़ गये।
थोड़ी दूर चलने के बाद हमें नीचे पेड़ों की झुरमुटे में से एक मैदान दिखाई दिया जहाँ कुछ बच्चे फुटबॉल खेल रहे थे। वहीं मैदान के ऊपर  एक खेत में हमे कुछ बकरियाँ घास चरती हुई दिखाई दे रही थी। बकरियों और फुटबॉल खेलते लोगों की तस्वीर निकालने के बाद हम लोग थोड़ी देर खड़े होकर यही सोचते रहे कि आगे क्या करना है।आगे बढ़ना है या वापिस हो जाना है। साढ़े छः हो गये थे और चूँकि मुझे  कठलौ जाना था तो हम लोगों ने वापस जाने का विचार बना लिया।
हम लोग ऊपर की तरफ बढ़ने लगे। मैं आगे आगे बढ़ रहा था और बाकी लोग पीछे थे। बहने नीचे तो आसानी से उतर आईं थी लेकिन अब ऊपर चढ़ने में उन्हें दिक्कत हो रही थी। वह धीमी धीमी चाल से चल रही थी। कुछ देर बाद ही पीछे से बहनों के चीखने की आवाज आई। मैं पलटा तो देखा दोनों बहने जिन्हें कुछ देर पहले एक एक कदम उठाना मुहाल लग रहा था अभी किसी धावक की तरह  भाग रही हैं और जो बकरियाँ कुछ देर पहले चुपचाप घास चर रही थी वो न जाने क्यों उन्हें खदेड़ते उन्हें उनके पीछे भागी चली आ रही हैं। कुछ देर तक तो मैं अचरज से उन्हें देखता रहा लेकिन फिर थोड़ी देर में ही मैं पेट पकड़ कर हँसने लगा।
हुआ यूँ कि तेजी से भागती बकरियों के सामने लड़कियों की क्या चलनी थी। कुछ ही देर में बकरियों ने  लड़कियों को पकड़ लिया था और फिर कुछ ऐसा हुआ कि सभी हँसने लगे। जिन बकरियों से डर कर दोनों लड़कियाँ भाग रही थीं वो बकरियाँ उनको नजरअंदाज कर उन्हें छोड़कर ऊपर बढ़ गयी। ये देखकर जो लोग पहले घबरा रहे थे वो अब बुक्का फाड़ कर हँस रहे थे।
बकरियाँ मेरे पास पहुँची तो नीचे से उनके मालिक भी दिखाई दिए। उन्होंने मुझे बकरियों को रोकने के लिए कहा तो मैं भी बकरियों को नीचे की तरफ भेजने की कोशिश करने लगा। पर वो बकरियाँ तो शायद ऊपर जाने के लिए दृढ थी और नीचे जाने को राजी नहीं थी। एक आध को खदेड़ा भी लेकिन वह मान नहीं रही थी। वहीं उन तीनों में से एक भेड़ भी थी जिसके सींघ देखकर मुझे थोड़ा डर लग रहा था। भेड़ जिन्हें हमारे यहाँ खाडू कहते हैं अपने सींघों से वार करने के लिए कुख्यात हैं। एक अच्छी बात ये थी कि तीनों में से दो बकरियाँ छोटी थी और एक बड़ी थी। भेड़ भी बच्चा ही था। अगर वो बड़ा होता तो मामला जुदा होता तब मैं शायद उन्हें नहीं रोकता। पर चूँकि ऐसा न तो   मैंने  उनमे से सबसे बड़ा बकरा था, जो कि उनका लीडर लग रहा था, उसे पकड़ लिया। उसके गले में एक रस्सी बाँधी हुई थी और उसी के माध्यम से मैंने उसे थाम रखा था। जब  लीडर मेरे काबू में आया तो बाकी के दोनों भी वहीं पर रुक गये। थोड़ी ही देर में उन बकरियों के पास उनके मालिक पहुँच गये और उन्होंने अपनी बकरियों को थाम लिया। मम्मी के पूछने पर उन्होने बताया कि वो लोग बगल के च्यून्चा गाँव के थे। वो लोग बकरी लेकर नीचे जाने लगे क्योंकि उनके मुताबिक अभी बकरियों को और चराया जाना था। हम लोग भी अभी हुई घटना और गलतफहमी के ऊपर हँसते हुए आगे बढ़ गये।
खेत पर चलते हुए
खेत में आगे बढ़कर पीछे मुड़कर खींची गयी तस्वीर
ढाँढरी की तरफ आती  सीढ़ियाँ
ढाँढरी की तरफ जाते हुए बीच में पड़ता एक यात्री विश्राम ग्रह 
जंगल में लगाई गयी आग
एक अनजाना रास्ता, वक्त कम था वरना इधर भी जाया जाता
शैतान बकरियाँ और खेत में खेलते बच्चे
बकरियों के आतंक से बचने के बाद हँसते हुए नव पथिक
खेत से दिखता हमारा घर
कठलौ की यात्रा:
अब हम उसी खेत में था जहाँ से नीचे को हम आये थे। इधर चलते हुए मेरी नज़र ऊपर की तरफ गयी तो मुझे अपना घर दिखाई दिया। मैंने फट से उसकी फोटो ले ली और उस फोटो को इन्स्टाग्राम पर भेज दिया।
अब मेरी मंजिल उस दोराहे तक थी जहाँ से नीचे कठलौ तक रास्ता जाता था। कठलौ का नाम कठलौ कैसे पड़ा ये मेरे लिए भी एक रहस्य ही है। जब हम वहाँ से लौट आये तो थे तो साबी चाची न बताया था  कि क्योंकि उधर पानी जमीन को काटकर निकलता है तो शायद इस कारण उसका नाम कठलौ हो गया। असल बात क्या है यह कौन जान सकता है? उनका यह उत्तर मुझे जँचा जरूर था। पहले लोग नाम ऐसे ही रख देते थे।
खैर, थोड़ी देर चलने के बाद हम उस जगह पहुँचे जहाँ से नीचे जाने के लिए रास्ता जाता  है।  यहाँ पर हमने निर्णय किया कि मैं नीचे तक जाऊँगा और मम्मी और बहने इधर ही रूककर मेरा इन्तजार करेंगे। मैं नीचे उतरता जा रहा था। सँकरी पगडंडियाँ थी जहाँ से सम्भल सम्भल कर कदम रखना होता था। वही खेतों में महिलाएं काम कर रही थीं जो रह रहकर ऊपर खेतों में मौजूद कुछ बच्चों को को गालियाँ दे रही थीं।
आजकल पतंग बाजी का मौसम चल रहा था और जब पंतगों के पेंच लड़ते हैं तो पतंग कटकर नीचे इन खेतों में आती है। बचपन में हम भी इन खेतों में कूदते हुए पतंग हासिल करने के लिए उनके पीछे भागते रहते थे। आज भी बच्चे यही करते हैं। चूँकि खेतों में कार्य चलता है और ऐसे में बच्चे जब पतंग के पीछे भागते हैं तो खेत की फसलों को नुकसान भी पहुँचाते हैं और इस कारण गाली खाते हैं। बचपन में हम लोग जब खेतों में क्रिकेट खेलते थे तो कई बार ऐसा होता था। आज भी वही हो रहा था महिलाएं गाली देकर या पत्थर फेंकर बच्चों को खेत में कूदने फांदने से हतोत्साहित कर रही थीं। समय भले ही बदल जाए लेकिन कुछ चीजें होती हैं जो कि वैसे ही रहती हैं। बस पात्र निभाने वाले कलाकार बदल जाते हैं। हैं न?
बचपन की इन्हीं यादों में खोया हुआ मैं नीचे पहुँचा। एक दो बार रास्ता भटका भी लेकिन खेत में मौजूद एक महिला के दिशा निर्देश का पालन करता हुआ आखिरकार अपनी मंजिल तक पहुँच ही गया।
कठलौ की तरफ बढ़ते हुए पीछे मुड़कर खींची गयी तस्वीर
पहुँच गये मंजिल पर,झुरमुटों के बीच में मौजूद कठलौ
पानी की कलकल आती ध्वनि झुरमुटो से आती ऐसी लग रही थी जैसे कोई जीव गुर्रा रहा हो। हरे हरे पत्तों से ढका कठलौ किसी ऐसे बुजुर्ग सा प्रतीत हो रहा था जिसे मिलने के लिए मैं न जाने कितने वर्षों और कितने समय काल की यात्रा करते हुए मैं उधर पहुँचा था। घबराते सकुचाते हुए मैं उधर दाखिल हुआ। जब हम बचपन में इधर आते थे तब यह जगह वनस्पतियों से ऐसे घिरी नहीं होती थी। लेकिन आज घिरी हुई थी। मैं कदम बढाते हुए उधर पहुँचा।
आहा!! जमीन का सीना चीर कर आता पानी मन प्रसन्न कर रहा था। पानी गिर रहा था। जहाँ पानी गिर रहा था उधर कुछ पत्थर मौजूद थे। कुछ पर काई जमी हुई थी। मैं कुछ देर तक इसे देखता रहा।
यात्रा में जब तक मंजिल तक न पहुँचो तो एक तरह का जोश मन में भरा रहता है। एक दृढ़ता रहती है कि हमे अमुक स्थान तक पहुँचना है लेकिन कई बार  जब आप अपनी मंजिल को पा लेते हो तो एक तरह की रिक्तता आपके मन में आ जाती है। एक तरह का खाली पन जैसे जो इच्छा उस वक्त तक आपके अंदर मौजूद थी वह अब खत्म हो चुकी है और एक तरह का खालीपन यह  छोड़ चुकी है। कई बार मुझे ऐसे मौकों पर लगता है कि सफर मंजिल से ज्यादा जरूरी है। जीवन की यात्रा में भी मुझे ऐसा ही अहसास होता है। हम कहीं पहुँचने के लिए भागते रहते हैं लेकिन जब मंजिल तक पहुँचते तो भागते हुए पाते हैं कि हमने इधर पहुँचने के लिए काफी कुछ जरूरी खो दिया है। इसलिए मेरा मानना रहा है कि यात्रा हो या जीवन मंजिल से जरूरी रास्ता होता है। रास्ता खूबसूरत होना चाहिए। आप क्या कहते हैं?
अभी भी यह खालीपन मेरे अंदर था और इसी के चलते मैं वापिस जाने लगा। मुझे मलाल नहीं था क्योंकि रास्ता खूबसूरत रहा था। आज तो आम सी यात्रा में काफी कुछ अनुभव हो गया था। मैं मुड़ा ही था  लेकिन फिर अचानक से एक और इच्छा मन में अपना सिर उठाने लगी। पानी था और मैं था। अब इस शीतल जल से चेहरा धोने की इच्छा बलवती हो गयी थी। मैं आराम से धारे की तरफ बढ़ गया। उधर मौजूद पत्थरों पर चढ़ा और इस बात का ध्यान रखा कि काई वाले पत्थर पर मेरे पाँव न पड़े। बचपन में बारिश के दिनों में ऐसे कई कई वाले पत्थरों पर मैं फिसला हूँ। एक बार तो फिसलने से बचने के लिए दीवार में उगी घास पकड़ने की कोशिश की थी और लेने के देने पड़ गये थे। मैंने  जो चीज पकड़ी थी वो कंडाली(बिच्छू घास) थी जिसके कारण हाथों में जो जलन(खुजली) हुई थी कि मन में आया था इससे अच्छा तो गिर ही जाता कम से कम जो दर्द होता उसी वक्त होता जबकि कंडाली का असर काफी देर तक रहने वाला था। बचपन की यह याद अचानक मेरे मन में आई और इसलिए इस समय मैं ध्यान पूर्वक एक एक पत्थर पर पाँव रखकर धारे तक पहुँचा और फिर पहले मुँह हाथ पानी में धोया और बाद में दो चार बार उस मीठे पानी को पिया। अब मन संतुष्ट था।
पत्थरों से घिरा कठलौ
मम्मी लोग मेरा ऊपर इन्तजार कर रहे थे। अब अँधेरा भी होने वाला था। यहाँ चूँकि पानी है तो कई बार जानवर इधर आते हैं। तेंदुए इत्यादि पानी के लिए आते हैं। इसलिए अब ऊपर बढ़ना ही समझदारी थी। तेंदुओं से मिलने की मेरी इच्छा नहीं थी।
मैं अब ऊपर की तरफ बढ़ने लगा। पतली पतली पगडंडियों से होता हुआ कुछ ही देर में मैं ऊपर पहुँच चुका था। मम्मी लोग उधर ही मेरा इन्तजार कर रहे थे और हम लोग घर की तरफ बढ़ चले।
वहाँ पर ही मुझे एक बच्चा दिखाई दिया जो कि दो तीन पतंगो को पीठ पर लगाकर ऊपर आसमान में टकटकी बांधे खड़ा था। उसे पतंग के कटने का इन्तजार था। महिलाओं की गालियों का उस पर असर हुआ हो यह कहीं से नहीं लग रहा था। हमारे ऊपर कौन सा असर होता था?
उस पतंग कटने का बेसब्री से इतंजार करते देख मन में ख्याल आया कि जीवन ऐसा ही तो है। एक का नुकसान दूसरे के लिए मौका होता है। एक का जीवन दूसरे का भोजन होता है। जिसकी पतंग कटेगी उसका मन दुखी होगा। जिसका खेत खराब होगा वह दुखी होगा। लेकिन वह पतंग इस बच्चे के हाथ में आई तो इसके मन में ख़ुशी होगी। किसी और बच्चे के हाथ में आई तो यह दुखी होगा। जीवन यही है। खोना पाना और फिर खोना। इसी खोने पाने के फेर में हम लोग जीते जाते हैं।
पल भर को मेरे मन में ये ख्याल आया और पल भर को गायब हो गया। कुछ पाया और कुछ खो गया।
अब हम लोग ऊपर चढने लगे। कुछ ही देर में हम अपने घरों के नजदीक थे। हम लोग साबी चाची लोगों के घर दाखिल हुए। एक घंटे की घुमक्कड़ी का समापन हो गया था। अंदर घुसते हुए हम क्या जानते थे कि वहाँ गरमागर्म जलेबी और चाय हमारा इन्तजार कर रही थी।
एक अच्छी घुमक्कड़ी के बाद जलेबियाँ खाने को मिल जाएँ, इससे बेहतर कुछ हो सकता है भला।
चाय, जलेबी और बकरी के आंतक के किस्से बताते हुए हम लोग हंसते जा रहे थे। हँसने को और भी बातें थी लेकिन उनका इधर जिक्र करना ठीक नहीं है। इस एक घंटे की यात्रा ने मुझे स्फूर्ति से भर दिया था। हम लोग खुश थे। मैं अब अगली यात्रा की योजना पर काम करने लगा था।
सलाम कठलौ, फिर मिलेंगे
चढ़ो पगडंडियों पर
पतंग की तलाश में चलता लड़का
समाप्त 
 
© विकास नैनवाल ‘अंजान’

About विकास नैनवाल 'अंजान'

मैं एक लेखक और अनुवादक हूँ। फिलहाल हरियाणा के गुरुग्राम में रहता हूँ। मैं अधिकतर हिंदी में लिखता हूँ और अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी करता हूँ। मेरी पहली कहानी 'कुर्सीधार' उत्तरांचल पत्रिका में 2018 में प्रकाशित हुई थी। मैं मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी नाम के कस्बे के रहने वाला हूँ। दुईबात इंटरनेट में मौजूद मेरा एक अपना छोटा सा कोना है जहाँ आप मेरी रचनाओं को पढ़ सकते हैं और मेरी प्रकाशित होने वाली रचनाओं के विषय में जान सकते हैं।

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9 Comments on “कठलौं: एक छोटी सी यात्रा”

  1. बहुत अच्छी लगी आपके गाँव के कठलौ की घुमक्कड़ी । मैं नैनीताल साइड के गाँव के परिवार को जानती थी । अम्मा अक्सर अपने गाँव के काँच जैसे साफ और मीठे पानी का जिक्र किया करती थींं । आपके संस्मरण की फोटोज देख कर अम्माजी के गाँव की बताई बातें साकार हो गई ।

  2. आभार मैम। जी ऐसे पानी के स्रोतों से पानी लेने का अपना सुख होता है। सबसे मज़े की बात ये कि इनसे गर्मी में ठंडा और ठंड में गुनगुना पानी आता है। अगर इधर नहाओ तो मज़ा आ जाता है।

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