काफी समय से कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। धीमे-धीमे ही लिखना हो रहा है। अब तक तीन-चार चैप्टर हो चुके हैं। पहला चैप्टर शायद 2023 में लिखा था। फिर छूट ही गया। अब जब मौका लगता है उसमें कुछ जोड़ता रहता हूँ। सोचा उस लिखाई का ही एक अध्याय आप सबके लिए यहाँ साझा करूँ।
क्या भूत होते हैं?
“क्या भूत होते हैं पापा?” रात के खाने पर अनु ने अपने पिता त्रिलोक से पूछा।
पापा, जो उस वक्त रोटी का निवाला तोड़कर उसे सब्जी के साथ खाने वाले थे, थोड़ा रुक से गए। उन्होंने अनु को गहरी निगाहों से देखा और फिर बदले में सवाल किया, “क्यों पूछ रही हो?”
“सवाल के बदले सवाल करना अच्छा नहीं होता, पापा। मम्मा ही कहती हैं,” अनु ने मम्मा की बात से पापा के सवाल को कुछ देर के लिए रोका। यह सुनकर उसके पापा-मम्मी के चेहरे पर मुस्कान सी आ गयी।
“हम्म, कहती तो सही हैं मम्मा,” पापा मुस्कराकर बोले। “चलो, एक वादा करो। एक सवाल तुम पूछो। मैं उसका जवाब दूँगा। एक मैं पूछूँगा। तुम जवाब देना। ठीक है।” पापा ने अपनी बात रखी।
“ठीक है, पापा,” अनु के पास हामी भरने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था।
“तो तुम्हारे सवाल का जवाब है। पता नहीं।”
अनु हैरान होकर अपने पापा को देख रही थी। उसे ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। इस वाले सवाल के जवाब में तो लोग ‘हाँ’ या ‘न’ कहते थे। मसलन वो मम्मी से पूछती तो वो ‘ना’ कहतीं और नानी से पूछती तो वो ‘हाँ’ कहतीं। ये ‘पता नहीं’ यहाँ कैसे फिट होता था ये वो समझ नहीं पा रही थी।
“पता नहीं?”
“हाँ। अब मेरी बारी,” पापा ने मुस्कराते हुए कहा।
“पर पापा..”
“देखो अनु तुमने ही हामी भरी थी। ऐसे में अपनी बात से मत मुकरो।”
“ठीक है पापा। अब आप पूछिए।”
“तो ये सवाल क्यों पूछ रही हो?”
“बस ऐसे ही।” अनु ने भी नहले पर दहला मारा। “अब आप बताइए। पता नहीं मतलब?”
“पता नहीं का मतलब है कि मुझे नहीं पता। मैं पूरे विश्वास के साथ कुछ भी नहीं कह सकता हूँ। भूत हो भी सकते हैं और नहीं भी। मेरा आजतक किसी भूत से सामना नहीं हुआ है।”
“तो आप हॉरर नॉवेल क्यों लिखते हैं?”
“क्योंकि वो मज़ेदार होते हैं बेटा और मुझे लिखते हुए मज़ा भी आता है। उन्हें पढ़कर लोगों को आनंद आता है और लेखक के तौर पर मुझे भी रोमांच पैदा करने के अधिक विकल्प मिल जाते हैं,” लगता है अब पापा खेल के रूल भूल गए थे। ऐसे में अनु ने इसका फायदा उठाना चाहा और एक और सवाल दाग दिया।
“तो क्या आपको लगता है कि भूत नहीं होते?”
“मैंने ऐसा तो नहीं कहा। मैंने खुद कभी महसूस नहीं किया लेकिन कई ऐसे जानकारों के अनुभवों को सुना है जिन पर मुझे विश्वास है। ऐसे में मैं इस विषय में कोई राय कायम नहीं कर पाता हूँ।”
“हम्म,” अनु बोली।
“अब तुम बताओ अचानक तुम्हारी रुचि भूतों में कैसे जागी? अब ‘ऐसे ही’ वाला जवाब मत देना। मुझे पता है तुम ‘ऐसे ही’ कुछ नहीं करती।”
“पापा… वो मैं… वो मैं… ”
“क्या तुम मेरी लिखी किताबें पढ़ रही हो?”
“नहीं पापा! आई स्वेर।”
“कसम खाने की जरूरत नहीं है, बेटा। फिर बताओ कि बात क्या है।”
“वो पापा!!”
“तुम अभी बताना नहीं चाहती?” अनु को झिझकता देख पापा ने अगला प्रश्न किया।
“बोल अनु,” मम्मी जो अब तक चुप थीं वो भी बोलीं।
“जी पापा!!” अनु आखिरकार बोली।
“देखो! मैं तुम्हें फोर्स नहीं करूँगा अनु। उम्मीद है तुम कोई ऐसा काम नहीं कर रही होगी जो तुम्हारे लिए नुकसानदायक हो। बस ये याद रखना कि मैं यहाँ हूँ तुम्हारे लिए,” पापा बोले।
“अगर कोई जरूरत हो तो तुम हम दोनों को बता सकती हो बेटा,” अब मम्मी बोली।
“ये बात याद रखोगी न अनु।”
अनु ने हामी में सिर हिलाया।
“चलो अब खाना खा लो। कल सुबह स्कूल भी जना है,” पापा बोले तो अनु खाना खाने लग गयी। खाना खाने के बाद वह लोग अपने लिविंग रूम में बैठकर गेम्स खेलते थे और बातें किया करते थे। अनु को ये करना पसंद था। इसलिए वो बिना कोई नखरा किये खा रही थी।
उन्होंने खाना खत्म किया। फिर उन्होंने बटरस्कॉच आइसक्रीम खाते हुए लूडो खेला जिसमें हमेशा की तरह मम्मी फर्स्ट, अनु सेकंड और पापा लास्ट ही आए। ऐसा कभी-कभी ही होता था कि पापा जीतते थे और जब ऐसा होता था तो उसके अगले दिन उनकी पसंद की वैनिला आइसक्रीम सबको खानी होती थी। अनु को वैनिला पसंद नहीं थी पर पापा की जीत की खुशी में वो खा लेती थी। पापा भी तो उसकी पसंद की बटरस्कॉच अक्सर खाते थे।
गेम के बाद अनु वापस अपने कमरे मे गयी। उसके पापा भूतों के उपन्यास लिखते थे लेकिन भूतों के प्रति उनकी ये राय होगी ये उसे पता नहीं था। उसे पता नहीं चल रहा था कि वो अब क्या करे। किस्से भूतों के बारे में अपने सवाल पूछे?
यही सब सोचते सोचते कब उसे नींद आ गयी अनु को भी पता नहीं लगा।

अनु ये सवाल अपने पिता से क्यों पूछ रही थी? क्या कुछ था जो उसे परेशान कर रहा था? इन सवालों के जवाब तो आप अनु से मिलकर ही जान पाएँगे। पर अनु से आपका मिलना कब होगा ये फिलहाल तो मुझे भी नहीं पता है लेकिन इशिता से आप मिल सकते हैं। इशिता की सूझबूझ 33 पृष्ठों में फैली मेरी लिखी बाल कथा है जिसमें मेट्रो की यात्रा के दौरान घटित हुई घटना को केंद्र बनाया गया है। यह किताब साहित्य विमर्श प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।
अगर आपने ‘इशिता की सूझबूझ’ पढ़ी है तो आप मुझे अपनी राय मेल कर सकते हैं। अगर अब तक पढ़ी नहीं हैं तो साहित्य विमर्श की वेबसाइट पर जाकर मात्र 149 रुपये में 8 रंगीन चित्रों से सुसज्जित ये बड़े साइज़ वाली किताब खरीद सकते हैं।
किताब का लिंक: इशिता की सूझबूझ
फीचर इमेज क्रेडिट: चैटजीपीटी के माध्यम से बनाया गया।

इसे पूरा कीजिए।
जी पूरी करने की कोशिश है इस साल के अंत तक।