आखिरी भोज – टी डी हैम

आखिरी भोज - टी डी हैम

आखिरी भोज टी डी हैम की अंग्रेजी कहानी ‘द लास्ट सपर’ का हिन्दी अनुवाद है।

टी डी हैम एक विज्ञान गल्प लेखिका थीं। टी डी हैम इनका छद्दम नाम था। इनका असल नाम थेलेमा हैम इवांस था। इनका जन्म 1905 में हुआ था और इनका देहावासन 1994 में हुआ था। 1952 से 1961 के बीच इन्होंने कुछ दर्जन भर विज्ञान कथाएँ  लिखी  थीं। (स्रोत)यह कहानी ‘द लास्ट सपर’ 1952 में इफ वर्ल्डस ऑफ़ साइंस फिक्शन नाम की पत्रिका के सितम्बर अंक में प्रकाशित हुई थी। यह एक डिसटोपियन कहानी है। जैसा की इस तरह की कहानियों में होता है इनका घटनाक्रम ऐसे समय की कल्पना करके रचा होता है जब मानव सभ्यता लगभग समाप्त हो चुकी है। यह भी ऐसे ही समय की कल्पना करती हुई कहानी है। कहानी छोटी है पर मुझे रोचक लगी और इस कारण मैंने इसका हिन्दी अनुवाद करने का मन बनाया। यह कहानी मुझे प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग के माध्यम से पढ़ने को मिली।

अंग्रेजी में मौजूद मूल कहानी आप निम्न लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं:
द लास्ट सपर


अपनी बाँहों में थामे हुए बच्चे के कारण वह औरत अब उतनी तेजी से नहीं भाग पा रही थी। उस औरत को देखकर गुल्ड्रान के मन में ख़ुशी की एक लहर सी दौड़ गयी। एक ऐसी लहर जिसने गुल्ड्रान के मन में अपने को मिले आदेशों की अवहेलना करने से उत्पन्न होने वाली ग्लानि की भावना तक को डुबा दिया था।

उनको मिले आदेश सीधे-साधे और संक्षिप्त थे जिनका पालन करना अतिआवश्यक था।

“किसी भी व्यक्ति को मानवों को अकेले पकड़ने की कोशिश करने की इजाजत नहीं थी। अगर किसी व्यक्ति को मानव दिखाई देते  तो उनके विषय में मुख्य यान को तुरंत बताना बेहद जरूरी था। छोटे यानों को उड़ान भरने के एक घंटे बाद वापस आना जरूरी था। अगर कोई यान किसी कारणवश एक घंटे के अंदर मुख्य यान पर  वापिस नहीं लौट आता है तो उसे हमेशा के लिए खोया हुआ समझ लिया जायेगा।”

एक हजार साल पहले हुई एक बड़ी दुर्घटना के कारण धरती अपनी धूरी से उलट गयी थी जिसके चलते  अब चारों और बर्फ का साम्राज्य था। जमे हुए समुद्र और हिमनद एक दूसरे की तरफ बढ़ रहे थे। गुल्ड्रान का दिमाग बेचैन होकर इस त्रासदी के विषय में सोच रहा था। अब चाहे गर्मी हो या सर्दी शीतलहरों और बर्फीले तूफानों का चलना आम सी बात हो गयी थी। इन तूफानों से पहले अक्सर ओले के साथ वर्षा होने लगती थी। इसी बर्फीली सतह पर मौजूद उस औरत के खाल में लिपटे पाँवों से बने निशानों के कारण ही वह उसको ढूँढ पाया था।

करीब एक हफ्ते पहले उन्हें दो इनसान तकरीबन जमी हुई अवस्था में भूखे प्यासे मिले थे। वह एक मानव विज्ञानी था और अपनी ट्रेनिंग के हिसाब से ही चीजों को देखा करता था ।  फिलहाल उसका दिमाग उस जानकारी के विषय में सोचने में मशगूल था जो उसे उन दोनों में से कम उम्र के व्यक्ति से मिली थी। बड़ी उम्र का व्यक्ति तो ठंड के कारण मर गया था लेकिन छोटे वाले ने इशारों से उन्हें बता दिया था कि इनसानों का एक समूह पश्चिम में मौजूद गुफाओं में मौजूद था। वहाँ मौजूद एक अनजाने आंतक के चलते वो दोनों उधर से भाग आये थे। गुल्ड्रान को उस औरत और बच्चे को देखकर उन पर दया आई। वह समझ रहा था कि उन दो मर्दों को इन्हें अपने साथ ले जाना एक तरह का बोझ ही लगा होगा और इसी कारण वे इन्हें छोड़कर भाग आये थे।

गुल्ड्रान यह सोचकर भी खुश था कि यह भी क्या सौभाग्य था कि  मनुष्य जाति का एक नर और एक मादा उन्हें जीवित मिल गये थे। अब इन्हें दूसरे ग्रह में ले जाया जा सकता था जहाँ इनका वंश फल फूल सकता था। और अगर गुल्ड्रान इस औरत को लेकर अपने यान पर लौट सकेगा तो यह उसकी एक बहुत बड़ी जीत होगी। इससे उसका यश चारो और फैल जायेगा। अपनी यश की कल्पना में वो इतना खो गया कि उसने यह निर्णय ले लिए कि उसे मदद बुलाने की कोई जरूरत नहीं थी। यह हथियारों से लेस कोई योद्धा दल तो था नहीं अपितु एक ब्रह्मांड के सबसे निराश्रय जीवोन में से एक थे- केवल एक बच्चा और उसको ढोती एक माँ।

गुल्ड्रान ने अपनी गति तेज की। वह पहले भी उस औरत को रुकने को बोल चुका था लेकिन उसकी आवाज ने  उस औरत को उससे और तेजी से दूर जाने के लिए ही प्रेरित किया था। वह शायद उससे डर रही थी। जरूर कोई न कोई ऐसा जादुई शब्द था जो कि इतनी शताब्दियों की निरक्षरता में भी बच गया था। कोई शब्द जो कि सभी निरक्षर लोगों के लिए दाल रोटी के समान था। गुल्ड्रान ने सोचा और अपने दोनों हाथों को अपने मुँह से लगाकर वो चिल्लाया, “भोजन! भोजन!” उसे उम्मीद थी खाने के विषय में सुनकर शायद वह औरत रुक जाये।

उसके आगे भागती औरत ने एक बार को अपने सिर को घुमाया, वह भागते भागते हवा में थोड़ा कूदी और फिर बदस्तूर आगे बढती रही। उसके भागने की गति में कमी तो आई लेकिन फिर भी वह भागती ही रही। शायद भोजन शब्द उसने पहचान लिया था। लेकिन डर का अहसास उसे गुल्ड्रान से दूर ले जा रहा था।

आवाज़ का असर होते देख गुल्ड्रान की दिल की गति बढ़ गयी। उसे अपना लक्ष्य और अपना यश नजदीक दिखने लगा और वह फिर चिल्लाया, “भोजन!!”

जैसे ही उसका पाँव फंदे की नर्म ढहती सतह के ऊपर पढ़ा तो उसे अहसास हो गया कि उसने कितनी बड़ी गलती कर दी थी। अब उसका शरीर नीचे मौजूद आग के द्वारा नोकीले किये गये लकड़ी के खूँटों की तरफ गिरने लगा था और उसे उस अनजाने आतंक का पता चल गया था जिसके चलते मनुष्य जाति के सबसे आखिरी दो मर्द  भागने को मजबूर हो गये थे।

लकड़ी के खूँटों ने गुल्ड्रान के शरीर को जगह जगह पर भींद दिया था। वह मर रहा था और वह औरत ऊपर खड़ी उसे देख रही थी। उसके दाँत किसी क्रूर भेड़िये की  तरह चमक रहे थे। उस औरत ने गड्ढे में मौजूद लहूलुहान गुल्ड्रान की तरफ उत्साह से इशारा करते अपने बच्चे को दिखाया।

“भोजन!” पृथ्वी में मौजूद आखिरी औरत ख़ुशी से चिल्लाई।

समाप्त

यह अनुवाद आपको ऐसे लगा? अपने विचारों से मुझे जरूर अवगत करवाईयेगा। अगर आपको ये अनुवाद पसंद आया तो इस पोस्ट को साझा जरूर कीजिएगा।

© विकास नैनवाल ‘अंजान’

About विकास नैनवाल 'अंजान'

मैं एक लेखक और अनुवादक हूँ। फिलहाल हरियाणा के गुरुग्राम में रहता हूँ। मैं अधिकतर हिंदी में लिखता हूँ और अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी करता हूँ। मेरी पहली कहानी 'कुर्सीधार' उत्तरांचल पत्रिका में 2018 में प्रकाशित हुई थी। मैं मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी नाम के कस्बे के रहने वाला हूँ। दुईबात इंटरनेट में मौजूद मेरा एक अपना छोटा सा कोना है जहाँ आप मेरी रचनाओं को पढ़ सकते हैं और मेरी प्रकाशित होने वाली रचनाओं के विषय में जान सकते हैं।

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0 Comments on “आखिरी भोज – टी डी हैम”

  1. कहानी का अंत शॉकिंग था.. बेहद शानदार लघु कथा

  2. शानदार अनुवाद । अनुवादक का विज्ञान गल्प पसंदीदा जेनर है तो इसमें वो रौ में नजर आये यद्यपि कहानी चयन और बेहतरीन हो सकता था ।

  3. जी, इसलिए तो वो इनसानों को ढूँढ रहे थे ताकि उन्हें किसी ऐसे ग्रह में ले सके जहाँ वो अपने वंश को बढ़ा सकें। ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया।

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