संस्मरण: ‘इसको तो खाना नहीं दूँगा’

संस्मरण: इसको तो खाना नहीं दूँगा

बचपन में जब पॉपआई को पालक खाकर ब्लूटो को मारते हुए देखता तो मन में ये आता था कि पॉपआई पालक की जगह गोभी, मटर, या बैंगन खा लेता तो उसका क्या बिगड़ जाता। मुझे पॉपआई पसंद था और ये उस समय की बात है जब मुझे पालक पसंद नहीं आता था। मैं यही सोचता था कि कोई एक डिब्बा पालक खा कैसे सकता है और फिर चलो किसी तरह निगल भी ले तो फिर किसी से लड़ने लायक स्थिति में कैसे रह सकता है? ये विचार मेरे बाल मन को काफी परेशान करता और फिर मन के भंवर में चक्कर मार मार कर धराशाही होकर गिर पड़ता।

पालक खाता हुआ पॉपआई, स्रोत: यूट्यूब

घर में जब आलू पालक की सब्जी बनती थी तो उसे खाने से मुझे हमेशा गुरेज रहता था और मैं उसे नहीं ही खाता था। घर वाले भी समझ चुके थे कि इसे खिलाने की कोशिश करना बेकार है और इसलिए वो मुझे आलू पालक खाने को कहते नहीं थे।

फिर कुछ ऐसा हुआ कि मैं आलू पालक की सब्जी खाने लगा।

तो हुआ यूँ कि मेरी छुट्टियाँ चल रही थीं। उन दिनों इलेक्शन भी होने वाले थे और इलेक्शन की तैयारी चुनाव में खड़े प्रत्याशी कर रहे थे। ऐसे में बब्बू भाई (योगेश नैनवाल), जो मेरे बड़े ताऊजी के लड़के हैं, और अनिल भाई, जो मेरी बड़ी बुआ के लड़के हैं, ने पूछा कि क्या घूमने चलोगे। अनिल भाई बब्बू भाई से दो तीन साल बढ़े हैं। और बब्बू भाई मेरे साथ तीन चार साल बढ़े हैं। ऐसे में जो रिश्ता मेरा और बब्बू भाई के बीच है और बब्बू भाई और अनिल भाई के बीच है। मेरी उम्र तो छोटी है तो मेरे और अनिल भाई के बीच के रिश्ते में थोड़ा फर्क है।

मैं उस समय बच्चा ही था। अब एक बच्चे की छुट्टी हो और उसे घूमने को मिल जाए तो क्या चाहिए। इससे शाम की पढ़ाई से भी वो बच्चा बच सकता था। पूरा दिन मटरगश्ती होगी और नहीं भी हुई तो पढ़ाई तो नहीं होगी। ये मैंने सोचा और खुशी खुशी घूमने उनके साथ चला गया। हम सब लोग एक टैक्सी में बैठे और निकल पड़े।

कार में बैठकर मुझे पता चला कि अनिल भाई को एक लोकल प्रत्याशी के प्रचार का काम मिला है और हमें एक गाँव में जाना है। यह टैक्सी भी उन्हीं की दी हुई है। हाँ वापस आने के लिए किराये की टैक्सी हमें करनी थी। साथ ही अनिल भाई को लक्ष्य मिला था कि हमें एक दिए गए संख्या के करीब लोगों से बात करनी थी और उनका नाम, उम्र इत्यादि नोट करना था। उन्हें प्रत्याशी के विषय में बताना था और नोट की गई जानकारी लाकर देनी थी। दिन भर ये काम करना था। फिर रात को शायद उन्हें इसके पैसे मिलते। पर उससे मुझे क्या था। मुझे तो घूमना था। वैसे भी घूमने का मौका कम ही मिलता था। मैं इसी में खुश था।

हम जल्द ही उस जगह पहुँच गए जहाँ से नीचे उतरकर जाकर हमें प्रचार करना था। इस प्रचार में हम चार लोग थे। अनिल भाई, बब्बू भाई, मैं और अनिल भाई का एक दोस्त जिसे हम मिस्टर पी कहते हैं। इस यात्रा में मिस्टर पी ऐसी शख्सियत थे जिन्हें भूलना मुश्किल है। अनिल भाई उस वक्त तक कॉलेज में थे तो मुझसे तो काफी लंबे चौड़े थे। फिर वो पहाड़ी लोगों की तुलना में लंबे भी थे। पाँच दस पाँच ग्यारह उनकी हाइट रही होगी । अनिल भाई के ये दोस्त मिस्टर पी भी इतने ही लंबे थे। गोरे चिट्टे थे। बाल उनके झड़ने लगे थे शायद लेकिन उन्होंने क्रयू कट करवा रखा था जो उन पर जँचता था। यानी व्यक्तित्व अच्छा खासा था। कॉलेज में थे और कॉलेज के लड़कों की तरह नशा वशा भी करते थे। पर नशा कुछ ऐसा कि एक खत्म करें तो दूसरा शुरू। चूँकि ये लड़के थे तो इनका प्लान प्रचार का तो था ही लेकिन साथ में थोड़ा पीने खाने का भी था। इस कारण जब हम उस जगह पहुँचे जहाँ से नीचे गाँव की तरफ जाना था तो मिस्टर पी ने अपने लिए चीजें जुगाड़नी शुरू की। चिप्स के पैकेट लिए गए, गुटके के पैकेट लिए गए, सिगरेट ली गई, कोल्डड्रिंक की बोतल भी ली गई।

मिस्टर पी खुश थे। पहाड़ में मौसम भी सुहावना था। हमारा नीचे का सफर शुरू हुआ तो मिस्टर पी पहले गुटका खाएँ, वो खत्म हो तो सिगरेट उड़ाएँ, वो खत्म हो तो फिर सुरा के घूँट भी गटके। इसके साथ साथ उनके अंदर की फ्रैंकनेस बढ़ती जाए और हँसी मजाक भी बढ़ता जाए। हम लग जब गाँव पहुँचे तो मिस्टर पी अपने कदमों में खड़े रहने के बस काबिल थे। अनिल भाई उन्हें संभाल भी रहे थे और साथ में हमारे कान में फुसफुसा भी रहे थे कि इसको कहता हूँ एक बार में एक नशा कर लेकिन ये सब करता है और फिर संभालना मुझे पड़ता है। अनिल भाई की वो सीख की आदमी को ज़िंदगी में एक ही नशा करना चाहिए मुझे आज भी याद है और इसलिए मैं चाय ही पीता हूँ।

खैर, किसी तरह प्रचार निपटा। गाँव वालों से उनकी समस्या पूछी गई। अपने प्रत्याशी का नाम बताया गया। उनका चुनाव चिन्ह बताया गया। गाँव वालों की नाम उम्र भी पूछी गई। ये सब सिलसिला खत्म हुआ। टारगेट अभी भी पूरा नहीं हुआ था तो एक आदमी मिला जो दूसरे गाँव का था। यह गाँव भी वहाँ से नजदीक ही था तो उससे उस गाँव के कुछ लोगों के नाम पूछे गए और उसे उन्हें भी अपना संदेश देने का आग्रह किया गया और हम लोग दो तीन घंटे बिताकर ऊपर की तरफ बढ़ गए।

मिस्टर पी जो नीचे उतरते हुए किसी बकरी की फुर्ती से आ रहे थे लेकिन अब ऊपर जाना था। फिर अब तक वो कुछ गुटके, दो एक सिगरेट और थोड़ी सुरा टीका चुके थे। अब जब ऊपर चढ़ने लगे तो उनकी आफत आने लगी। वो थोड़ा फ्रैंक तो थे ही तो अब ऐसी हरकतें करने लगे कि समझ न आता कि उन पर गुस्सा होएँ या चिढ़ें। कभी वो लेट जाते और कहते मुझे पड़ा रहने दो। अनिल भाई उनका हाथ पकड़ कर खींच कर उन्हें कुछ दूरी ले जाते तो वो हिम्मत छोड़ देते। फिर वो कुछ देर तक अर्धचेतन अवस्था में उधर रहते और खुद को भी गाली बकते और शायद प्रत्याशी को भी दो चार निकाल देते। फिर वो थोड़ा पानी पीते और कहते मुझे थोड़ा एनर्जी की जरूरत है तो मुँह में गुटका डाल देते और ऐसे फुर्ती से उठते जैसे कि अब सीधे ऊपर जाकर ही मानेंगे लेकिन मुश्किल से बीस पच्चीस कदम की चढ़ाई करने के बाद उनकी हिम्मत जवाब दे देती और वो निढाल होकर गिर जाते। एक दो बार तो मुझे भी उन्हें खींचना पड़ा था। मेरी उनको देखकर हँसी निकलने को होती लेकिन किसी तरह मैं अपने पर नियंत्रण बनाए रखता।

हम लोग ऐसे ही गिरते पड़ते ऊपर बढ़ते रहे। कोई आदमी नीचे आता मिलता तो मिस्टर पी उससे उसका नाम, उम्र पूछ कर प्रचार की जिम्मेददारी भी निभा देते और थोड़ी देर सुस्ता भी लेते। वो तब तक उस आदमी को उलझाए रखते जब तक वो आदमी खुद ही हाथ न जोड़ता और फिर हमें ऐसे देखते जैसे हमने उनकी चोरी पकड़ ली हो और बुक्का फाड़ कर हँस पड़ते। हम भी क्या करते हम सब बर्दाश्त करते और साथ में मिस्टर पी की हरकतों को देख हँसते भी रहते। फिर एक समय आया कि वो ऐसे निढाल हुए की सो ही गए। उन्हें उठाने की सभी कोशिश विफल हुई तो हमने उन्हें सोते रहने देने का ही फैसला कर दिए। हम भी अधिक थक चुके थे और सोचा हम भी थोड़ा आराम कर देंगे। हमने उन्हें आधा घंटा उधर ही सोने दिया और खुद बैठकर चिप्स और कोल्डड्रिंक पी। हमें बस इस बात का डर था कि हमें ऊपर पहुँचने में अधिक देर न हो जाए और हमें वापस लौटने के लिए कोई टैक्सी न ही मिले।

खैर, वो लगभग आधे घंटे बाद वो उठे तो थोड़ा तरो ताज़ा था। उठने के बाद उन्हें अपनी हरकतें याद भी नहीं थी और वो ऐसे हमारे साथ अब चलने लगे जैसे उनसे शरीफ आदमी कोई और न होगा। न गाली बकना, न रोना झिड़कना और न एनर्जी के लिए गुटका ही खाना। सुरा भी आदमी के व्यक्तित्व में कैसे कैसे बदलाव ले आता है ये उस वक्त काफी साफ तरीके से देखने को मुझे मिल गया था।

इसके बाद हम ऊपर पहुँचे। दुकान में पता किया तो गाड़ी आने की संभावना थी। हम प्रतीक्षा करने लगे और वहाँ थोड़ा चाय पानी पिया। अब लगभग छह साढ़े छह बज चुके थे। तब तक गाड़ी भी आ गई थी और हम गाड़ी में बैठकर पौड़ी के लिए निकल चुके थे। गाड़ी में अनिल भाई ने उस वक्त बताया कि प्रत्याशी जी की तरफ से प्रचार करने वालों के लिए रात्रि भोजन की भी व्यवस्था है। साथ में भी बताया कि उन्होंने मम्मी को इस बारे में बता दिया था। ये भी मेरे लिए अच्छी खबर थी। वैसे भी चिप्स और कोल्ड ड्रिंक से इतनी भूख भी नहीं मिटी थी और चलना फिरना काफी हो गया था। मिस्टर पी को भी कभी कभार मुझे खींचना पड़ा था। खैर, खाने के जगह पहुँचते पहुँचते सात साढ़े सात हो चुके थे।

वह एक छोटा सा ढाबा था। उस ढाबे के बाहर हमें एक भैया मिल गए थे जो मेरे पड़ोस में रहते थे। मान लीजिए कि उनका नाम ‘के’ था। ‘के’ भैया भी कॉलेज में थे। हमारे पड़ोस में रहते थे। वह एक दुबले पतले आदमी थे। लंबाई भी उनकी अनिल और मिस्टर पी से छोटी थी और शारीरिक गठन भी कम ही था। मैंने जब अनिल भाई को उनके बारे में बताया तो यूँ ही उनके बीच बातचीत हुई और फिर हम खाने के लिए चले गए।

अब हम खाने के लिए बैठे तो ढाबे के मालिक ने एक नजर हमारी तरफ मारी और वो दहाड़ा, “मैं इसको तो खाना नहीं दूँगा।” अनिल भाई और योगेश भाई ने मेरी तरफ देखा और मैंने अपनी आँखें नीचे कर दी। अब मैंने क्या किया? मैं सोचने लगा। एक पल को लगा कि उस समय मेरा वजन ज्यादा था तो शायद उसने ऐसा कहा हो। शायद अनिल भाई को भी ऐसा लगा तो उन्होंने अकड़ कर पूछा, “क्यों भाई क्यों नहीं दोगे?”

“अरे, भाई साहब आप जानते नहीं ये दिखता पतला है लेकिन खा इतना जाता है कि पूछो नहीं।”

अनिल भाई एक पल को सकपकाए और मैंने भी एक चैन की साँस ली। उन्हें और मुझे दोनों को लगा कि पतला कहा है तो मुझे तो नहीं ही बोला है। फिर भी चूँकि उन्होंने बात शुरू कर दी थी तो पूरी करने के गरज से बोले, “फिर भी दोगे क्यों नहीं भई? बात तो हो रखी है न नेता जी से?” फिर उन्हें ढाबे के लड़के को इशारा करके मुझे प्लेट देने को कहा और उसमें दाल, रोटी, सब्जी इत्यादि डालने को कहा।

“बात तो हो रखी है लेकिन वो इतने जन के खाने की हो रखी है। “, आदमी ने एक संख्या गिनाई।

“तो कितने हो गए?” भाई ने पूछा।

उसने बताया।

“तो अभी है तो लोग फिर। खिला तो सकते हो।”, अनिल भाई बोले।

“पर आप जानते नहीं हो कि ये कितना खाता है?”, आदमी ने अपना राग अलापा।

“अरे रोज रोज थोड़े न खाता है आदमी उतना”, तभी अनिल भाई के बगल में बैठे ‘के’ भैया बुदबुदाए।

अब अनिल भाई, मैं, बब्बू भाई, मिस्टर पी ‘के’ भैया को देखने लगे। वो हमारे समूह में सबसे पतले से थे और ढाबे वाला उन्हें खाना देने से डर रहा था।

“हुआ क्या था”, अनिल भाई ने ‘के’ भैया से पूछा।

“वो उस दिन थोड़ा भूख लग गयी थी तो थोड़ा ज्यादा खा लिया था।”

“अरे तीस पैंतीस रोटी खाना थोड़ा ज्यादा होता है।”, वो आदमी ऐसे बोला जैसे उसे अभी भी वो रोटियाँ नजर आ रही हो।

अब हम आँखें फाड़े उन्हें देख रहे थे।

“अरे डाइट ली थी न ?”, अब ‘के’ भैया बोले।

अब उन दिनों ढाबों में डाइट का सिस्टम होता था। यानी आप एक तय कीमत देते और जितना मर्जी खा सकते थे।

“अरे एक ही की तो डाइट होती है। तुम्हें देखकर लगेगा तुम तीस चालीस रोटियाँ खा लोगे। दोबारा आटा गूंथना पड़ा था मुझे।”, वो अपनी उस मेहनत को याद करता सा बोला।

तब तक मुझे खाना मिल चुका था। बाकी लोगों को भी मिलने लगा था।

“ठीक है। ठीक है। आज इतना नहीं खाएँगे।”, अनिल भाई ने बात खत्म करने की गरज से कहा।

“खाएँगे क्या? मैंने दूँगा ही नहीं बताए दे रहा हूँ। “, ढाबा वाला असल बात पर आते हुए बोला।

“ठीक भई जितना खुशी खुशी दोगे उतना ही सही”, ‘के’ भैया भी बड़ा दिल दिखाते हुए बोले।

फिर खाने का सिलसिला चल पड़ा। खाने में थी। पीली दाल, रोटी, आलू पालक, चावल। पहले हमें रोटी मिली थी जो मैंने आलू पालक के साथ खानी शुरू की तो मुझे स्वाद अच्छा लगा। शायद दिन भर घूमने के कारण भूख लग आई थी उसके कारण ऐसा था या फिर जो कुछ देर पहले लगने लगा था कि खाना नहीं मिलेगा उसके कारण। उस वक्त तो मैंने सोच लिया था कि आज रात भूख रहना पड़ेगा क्योंकि अनिल भाई मम्मी को खाना बनाने के लिए मना कर आए थे। पर सौभाग्यवश ऐसा कुछ नहीं हुआ।

खाना ‘के’ भैया को भी मिला और ढाबे में लोग ऐसे लोगों के किस्से सुनाने लगे जो कि दिखते तो डेढ़ पसली हैं लेकिन खाना इतना खा लेते हैं जो उनके शरीर से दोगुने तिगुने शरीर वाले भी न खा पाए।

खैर, जल्द ही हमने खाना खत्म किया। ‘के’ भैया ने भी हमारे साथ साथ खाना खत्म किया और कनखियों से उसे देखके ढाबे मालिक ने भी एक गहरी साँस ली। या शायद उसका साँस लेना मेरे मन का वहम रहा हो।

हमने ‘के’ भैया से विदा ली और अनिल भैया और बब्बू भैया मुझे घर छोड़ने के लिए चल पड़े। मिस्टर पी को कुछ काम था वो भी अपने घर को चल पड़े थे।

इसके बाद जब मैं घर पहुँचा तो मैंने मम्मी को यही कहा कि आलू पालक इतना भी बुरा नहीं होता है मम्मी। आप बनाया कीजिए।

मम्मी के चेहरे पर हैरानी थी। उन्हें लगा अचानक क्या बोलने लगा है ये बच्चा जो आलू पालक के नाम से नाक भौं सिकोड़ता था।

पर अगली बार जब आलू पालक बना तो मैंने खाया और वो मुझे स्वादिष्ट भी लगा।

तो इस तरह मैंने आलू पालक खाना शुरू किया। हाँ इसके बाद मैं किसी प्रचार में नहीं गया और मिस्टर पी के बारे में कई बार अनिल भाई से पूछा लेकिन उनसे मिलने का सौभाग्य दोबारा प्राप्त नहीं हुआ। हाँ, ये जरूर पता चला कि पीना और पीकर वैसी ही हरकतें करना उनका जारी रहा था।


नोट: इमेज में लगाई गयी आलू पालक की तस्वीर कुक विद मनाली की वेबसाईट से ली है। आप यहाँ क्लिक करके उनके द्वारा बताई गई रेसिपी पढ़ सकते हैं।

Written For #BlogchatterFoodFest

About विकास नैनवाल 'अंजान'

मैं एक लेखक और अनुवादक हूँ। फिलहाल हरियाणा के गुरुग्राम में रहत हूँ। मैं अधिकतर हिंदी में लिखता हूँ और अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी करता हूँ। मेरी पहली कहानी 'कुर्सीधार' उत्तरांचल पत्रिका में 2018 में प्रकाशित हुई थी। मैं मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी नाम के कस्बे के रहने वाला हूँ। दुईबात इंटरनेट में मौजूद मेरा एक अपना छोटा सा कोना है जहाँ आप मेरी रचनाओं को पढ़ सकते हैं और मेरी प्रकाशित होने वाली रचनाओं के विषय में जान सकते हैं।

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