वो चीजें जिनकी शक्ल पसंद आने के कारण मैंने उन्हें काफी टाइम तक नहीं खाया

वो चीजें जिनकी शक्ल पसंद आने के कारण मैंने उन्हें काफी टाइम तक नहीं खाया

मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है चीजों का स्वादिष्ट होने के साथ साथ अच्छा दिखना भी जरूरी होता है। कई बार चीजें होती तो अच्छी हैं लेकिन वो दिखती ऐसी हैं उनको खाने का मन ही नहीं होता। यह अच्छा दिखना भी व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर कर सकता है।

मुझे आपका तो नहीं पता लेकिन मेरे जिंदगी में कुछ चीजें ऐसी रही हैं जिनको मैंने काफी समय तक इसलिए नहीं खाया क्योंकि मुझे वो जैसी दिखती थी वो पसंद नहीं था। इन चीजों में से अधिकतर चीजें तो मैंने काफी पहले खानी शुरू कर दी थी लेकिन एक चीज आज तक भी नहीं खायी है। और शायद आगे भी न ही खाऊँ।

चलिए देखते हैं वो कौन सी चीजें हैं:

चाउमीन

Image by raju shrestha from Pixabay

चाउमीन भारत के सबसे प्रसिद्ध फास्ट फूड में से एक है। ठेले में मिलने वाला यह भोजन गाँव हो, कस्बा हो या शहर ही हो सब जगह समान रूप से प्रसिद्ध है। अब मैंने चूँकि इसे खा भी लिया है तो मैं ये भी जानता हूँ कि ये टेस्टी भी होता है। लेकिन काफी समय तक मैं इसे खाता नहीं था। इसका एक कारण इसका रंग और इसका आकार होता था। अब आपका तो मुझे नहीं पता लेकिन पौड़ी में जब भी बारिश आती है तो बारिश में पानी के बरसने के साथ साथ एक और चीज दिखने लगती है। लिसलिसे भूरे रंग की यह मोटे धागे जैसी चीज आपको घर के पास, रास्ते में, सीढ़ियों में रेंगती हुई मिल जाएगी। इन्हें केंचुआ कहा जाता है। सही बताऊँ जब पहली बार मैंने चाउमीन देखी थी वो मुझे इनका कुपोषित वर्शन ही लगी थी। यही कारण है कि काफी समय तक लोगों द्वारा चाउमीन की तारीफ करने के बाद भी मैंने इसे नहीं खाया था। फिर एक बार पापा मेले में ले गए थे और चाउमीन खाने का मौका लगा तो स्वाद इतना बेकार लगा कि प्लेट छोड़ ही दी थी। इसके बाद काफी समय तक चाउमीन खाने का न मौका लगा और न मैंने मौका ढूँढा। सिर ओखली में देने की आदत मेरी बचपन में नहीं थी। हाल फिलहाल ही ये बीमारी लगी है। खैर, यहाँ ये बता दूँ कि चाउमीन की बहन मैगी से मुझे ऐसी कोई दिक्कत नहीं होती थी। शायद उसका पीतवर्णी होना इसका कारण हो।

खैर, वापस चाउमीन पर लौटें तो काफी समय तक चाउमीन से मैंने दूरी ही बनाकर रखी थी। फिर एक बार परिस्थिति ऐसी हो गई कि हम कुछ भाई बहनों को सोलह सत्रह किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। ये सफर क्यों किया गया ये किसी अलग दिन बताऊँगा। लेकिन इस सफर के बाद जब बस पकड़कर हम अपने गंतव्य तक पहुँचे तो हमारे पास पैसे ही इतने बचे थे कि दो प्लेट चाउमीन हम पाँच लोग साझा करते। फिर भूख इतनी लग गई थी कि जो चाउमीन कभी पसंद न आई और जिनकी शक्ल केंचुओं जैसी लगती थी वो भी मजेदार लगने लगी। साथ ही बनाने वाले ने भी अच्छी बनाई थी। तो चाउमीन खाई गई और फिर यदा कदा इसे खाना लगा रहा।

अब चाउमीन खाने का मौका लगे तो मैं खा लेता हूँ। नाक भौं नहीं सिकोड़ता। लेकिन अभी भी ऐसा तभी करता हूँ जब साथी को चाउमीन खाना हो। खुद तो आज भी जाकर नहीं लेता।

मोमो

Image by raju shrestha from Pixabay

मोमो एक ऐसे फास्ट फूड हैं जिनके पीछे दिल्ली, देहरादून में लोग पागल हुए रहते हैं। पर क्या आप यकीन करेंगे कि देहरादून में चार साल रहा कॉलेज के वक्त और दिल्ली में दो तीन साल रहा था स्कूल के वक्त लेकिन इतने दिनों में मैं मोमो के अगल बगल से गुजरा जरूर लेकिन उन्हें खाने का मन कभी न किया।

मेरे दोस्त मोमो के शौकीन होते थे लेकिन मुझे उनकी शक्ल कभी पसंद नहीं आई। सफेद रंग के सॉफ्ट सॉफ्ट दिखते और ऊपर से भाप उनसे निकलती रहती। ऐसा लगता था जैसे किसी विशालकाय जानवर ने उन्हें उगला हो। या उनकी पतली पतली खाल देकर ऐसा लगता जैसे वो किसी एलियन के अंडे हो जिनके झिल्ली जैसी खाल फाड़कर जल्द ही कुछ एलियन जीव निकलने वाले हों।

ऐसे में जब भी मेरे दोस्त मोमो की प्लेट ऑर्डर करते तो मैं सूप का बाउल ऑर्डर कर देता और उससे खुश रहता।

लगभग 2021 तक मैंने मोमो नहीं ही खाए थे। 2020 में मेरी शादी हुई और 2021 के बीच से 2022 की जनवरी तक मैं देहरादून में रहा। मेरा तो वर्क फ्रॉम होम था लेकिन वाइफ उधर अपने सिंगिंग प्रोजेक्ट्स के वजह से थीं। वाइफ को मोमो खाने पसंद थे और एक बार उनके इसरार के बाद मैने मोमो ट्राई कर ही दिए।

खाए तो लगा कि इतने बुरे भी नहीं होते यार। हाँ,आज भी मैं अपनी मर्जी से साल में एक दो ही बार मोमो लाता हूँ लेकिन जब वाइफ मँगवाती है तो उनसे ज्यादा खा लेता हूँ।

भिंडी

By Jmprouty. – Own work., CC BY-SA 3.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=4214566

वैसे तो काफी सब्जियाँ जैसे अरबी, चोलायी, करेला, तोरी मुझे इसलिए नहीं पसंद आती हैं क्योंकि उनका स्वाद खराब होता है लेकिन भिंडी एकलौती ऐसी सब्जी है जो मुझे उसके रूप के कारण पसंद नहीं आती है। पता नहीं क्यों जब भी कटी हुई भिंडी और उससे झाँकते दाने देखता हूँ तो लगता है कि या तो ये एक एलियन है या फिर कोई एलीयन स्पेस शिप जो अपने भीतर ये दाने जैसे एलियन लेकर घूम रहा है। ऐसा नहीं है कि दाने वाली दूसरी सब्जी नहीं होती हैं। बैंगन के अंदर भी दाने होते हैं। हरी मिर्च के अंदर भी दाने होते हैं लेकिन जो वितृष्णा मुझे भिंडी को देखकर होती है वो शायद ही बैंगन या मिर्च को देखकर होती होगी। अब ये लिख रहा हूँ तो अहसास हो रहा है कि हरी मिर्च और उसके भीतर के दाने भी मुझे उतने पसंद नहीं हैं लेकिन चूँकि वो शायद बहुत कम प्रयोग होती है तो इतनी वितृष्णा नहीं जगा पाते जितने की एक कोटरी भिंडी। फिर भिंडी का स्वाद भी ऐसा नहीं है कि उसके रूप रंग को नजरंदाज कर दिया जाए।

ऐसा नहीं है कि मैंने भिंडी खायी नहीं है। खायी है। मेरी बहन को भिंडी बहुत पसंद है तो बचपन में हमारे घर में बनती थी तो एक दो बाहर घर वालों ने जबरदस्ती खिलाने की कोशिश करी लेकिन फिर जब उन्हें लगा ‘मुन्ने से ना हो पायी’ तो रोटी और मलाई मुझे देने को राजी हो गए। हाँ, मेहमान बनकर कहीं जाता हूँ और उधर मेजबान ने भिंडी बनाई होती है तो मैं किसी तरह से निगल लेता हूँ।

भिंडी की सब्जी की नापसंदगी की मेरी इंतेहा इस बात से पता लगा सकते हैं कि मैंने काफी पहले भिंडी की सब्जी के ऊपर एक कविता लिखने की कोशिश की थी। कविता पूरी तो नहीं हुई थी लेकिन उसकी पंक्तियों में मेरे भिंडी अप्रेम को साफ देखा जा सकता था। आज ये लेख लिख रहा हूँ तो यहीं पर प्रकाशित कर देता हूँ। कविता कुछ यूँ थीं:

आज पता चला हमारी शामत आई है ,
प्रिये ने भिंडी की सब्जी जो बनाई है ,

हमने दी सबको आँखों से दुहाई है,
क्या कीजियेगा भिंडी जो बनाई है,

देख हमें वो आज फिर मुस्कराई है
थाली में भिंडी उन्होंने सजाई है

पूछेंगी अब कभी ऐसी सब्जी खाई है
कहें क्या, जानते हैं उनकी राजशाही है

बैठे हैं अब फूटी आज अपनी रुलाई है
हमने भिंडी की सब्जी जो अभी खाई है

विकास नैनवाल अंजान

यह उस वक्त की बात है जब मेरी शादी भी नहीं हुई थी और मैं ये कल्पना करता था कि क्या हो अगर पत्नी इतनी खुर्राट मिल जाए और उसे भिंडी भी पसंद हो। फिर जब भिंडी बनी होगी घर में तो मेरी ऐसी ही हालत होगी। पर शादी होने के बाद इस कविता का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। पत्नी जी को भिंडी तो पसंद है लेकिन उनके साथ एक समझौता हो चुका है। जब उनके लिए भिंडी बनती है तो मेरे लिए अक्सर कुछ दूसरी चीज बन जाती है। ऐसे में ये तो मैंने पक्का कर दिया है कि ‘न फूटती मेरी अब रुलाई है’।

चीकू

ऊपर अब तक मैंने जिन खाने की चीजों का नाम लिया है। वह सभी ऐसे हैं जो मुझे उनके रंग रूप के कारण पसंद नहीं आते थे और मैं उन्हें खाता नहीं था लेकिन अब या तो खाने लगा हूँ या खाने की जरूरत पड़ जाए तो किसी तरह निगल लेता हूँ। लेकिन चीकू एक मात्र ऐसी चीज है जो मुझे कभी देखकर पसंद नहीं आया। कहने को तो ये फल है लेकिन किस मूड में इसे बनाया गया समझ से परे है। फल आप कोई भी देखिए तो खाने में भले ही जैसे ही हों लेकिन रूप रंग उनका कितना सजीला सलौना होता है। आप फलों की टोकरी लीजिए और उसमें सब फल रखिए और फिर बीच में दो चार चीकू डाल दिए तो लगेगा जैसा किसी खूबसूरत लिबास पर किसी ने पैबंद टाँक दिए। अगर चीकू सब्जी होता तो मुझे उससे दिक्कत नहीं होती और शायद मैं उसे खा भी लेता लेकिन वो है फल। ऐसा लगता है जैसे बनाने वाला आलू बनाने के मूड में था और उसमें गलती से रस डाल दिया। आलू भी छिल जाता है तो उजला हो जाता है लेकिन चीकू रहता चीकू ही है। छिला आलू भी चीकू से अच्छा दिखता है।

यही कारण है कि आजतक मेरी चीकू खाने की हिम्मत नहीं हुई। मुझे याद है मैं जब बारहवीं में था तो नानी के यहाँ उत्तम नगर जाया करता था। उनका फ्रिज खोलता तो वहाँ अलग अलग समय पर होते सेब, पपीते, तरबूज, खरबूज, आम, स्ट्रॉबेरी इत्यादि। फ्रिज के ऊपर होती टोकरी जिसमें होते केले, संतरे, कीनू, माल्टे इत्यादि। इन्हें देखकर मन खुश हो जाता। लेकिन फिर इन्हीं फलों के बीच में कहीं मुझे अपने को घूरते दिखते चीकू। मेरे चेहरे पर आयी मुस्कान थोड़ा कम हो जाती और फल खाने का मन मर सा जाता।

मुझे लगता है कि हर चीकू को ऊपर वाले से कहना चाहिए अगले जन्म मुझे चीकू न कीजो। जहाँ तक मेरी बात है तो मुझे ये पता है कि मैं चीकू शायद इस जन्म में तभी खा सकता हूँ जब धरती पर खाने की सामग्री खत्म हो जाए और बस खाने को बचे रहे तो केवल चीकू। या फिर ख़ुदा-न-ख़्वास्ता मेरे बच्चे को कभी चीकू पसंद हो और वो मुझे चीकू खाने को कह दे। तब देखना पड़ेगा कि क्या करना है। माँ बाप अपने बच्चों के लिए बड़े बड़े त्याग करते हैं। क्या पता मुझे चीकू खाने का त्याग करना पड़े? क्या कहते हैं?


तो यह थीं कुछ चीजें जो मैंने खाने में देर लगायी या आज तक नहीं खायी क्योंकि मुझे उनका रूप रंग पसंद नहीं आया। क्या आपकी ज़िंदगी में भी ऐसी कुछ चीजें हैं?

कमेंट करके जरूर बताइएगा।

Written For #BlogchatterFoodFest2024

About विकास नैनवाल 'अंजान'

मैं एक लेखक और अनुवादक हूँ। फिलहाल हरियाणा के गुरुग्राम में रहत हूँ। मैं अधिकतर हिंदी में लिखता हूँ और अंग्रेजी पुस्तकों का हिंदी अनुवाद भी करता हूँ। मेरी पहली कहानी 'कुर्सीधार' उत्तरांचल पत्रिका में 2018 में प्रकाशित हुई थी। मैं मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी नाम के कस्बे के रहने वाला हूँ। दुईबात इंटरनेट में मौजूद मेरा एक अपना छोटा सा कोना है जहाँ आप मेरी रचनाओं को पढ़ सकते हैं और मेरी प्रकाशित होने वाली रचनाओं के विषय में जान सकते हैं।

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4 Comments on “वो चीजें जिनकी शक्ल पसंद आने के कारण मैंने उन्हें काफी टाइम तक नहीं खाया”

  1. चीकू पर कोई कमेंट अच्छा नहीं लगेगा, हमारा प्यारा चीकू।
    चीकू‌ को कोई कुछ नहीं कहेगा….सुना सबने।

    मोमोज और पास्ता खाने के बाद भी कभी‌ पसंद नहीं आये।

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